विजय शुक्ला

विवादित नागरिकता कानून को लेकर कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक मचे कोहराम के बीच झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दो नंबरी नेता अमित शाह का मानसिक संतुलन बिगड़ सकता है।

 दो साल के भीतर भारतीय जनता पार्टी की 6 राज्यों से सरकारी उखड़ चुकी हैं और देश के 71% हिस्से से सिमटकर वह 32% पर आ सिमटी है। झारखंड विधानसभा चुनाव के ब्रांड एम्बेसडर नरेंद्र मोदी ने हिंदुओं को लामबंद करने के लिए 9 चुनावी रैलियां कीं और सभी रैलियों में मोटे तौर पर यह कहते पाए गए कि जो लोग आज देश मे आग लगा रहे हैं उन्हें कपड़ों से पहचाना जा सकता है।  काश, 2002 के  गोधरा कांड में सीबीआई को  मोदी जी की तरह थोड़ा भी ज्ञान होता तो 1000 बेगुनाहों की जान लेने वाले हत्यारों को  कपड़े देखकर आसानी से पकड़ लिया जाता मगर कपड़े देखकर हिंसा फैलाने वालों को तो सिर्फ अपने प्रधानमंत्री ही पहचानने की विद्या जानते हैं।   चुनाव के ऐन वक्त पर मोदी हिंदू- मुसलमानों पर भड़काऊ बयान क्यों देने लग जाते हैं ? यह महज संयोग तो नहीं हो सकता। गोधरा कांड के बाद वहां के मुख्यमंत्री रहते मोदी ने एक अंग्रेजी न्यूज एजेंसी से चर्चा में इस घटना पर दुख या खेद प्रकट करने की बजाय कहा था-"जब गाड़ी चलती है तो पिछले पहिए में पिल्ले कुचल कर मर ही जाते हैं।" मोदी के चुनावी भाषणों में सांप्रदायिकता हमेशा निशाने पर होती है। निर्वाचन आयोग की सख्ती का कोई मतलब नहीं है क्योंकि मुंह देखकर निर्णय करना उसकी आदत बन चुका है!

बहरहाल, नागरिकता कानून को देश की जनता पर थोपने के तुरंत बाद भाजपा का झारखंड में तंबू उखड़ गया और ब्रांड एम्बेसडर की बैंड बज गई। जनाक्रोश का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 5 बार से विधायक और राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास चुनाव हार गए । क्या नागरिकता कानून का दांव भाजपा को उल्टा पड़ गया ? और दूसरा सवाल यह कि महाराष्ट्र और झारखंड राज्य हारने की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को  पद पर बने रहने का अधिकार है ? लगता है जनता द्वारा 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को दिया गया जनादेश मोदी और शाह को अजीर्ण लगने लगा है। भारत के किसी प्रधानमंत्री को अपनी गरिमा के विपरीत जाकर हल्का ,निचले स्तर का भाषण और बयान देते हुए हम लोग पहली बार सुन रहे हैं ।एक प्रधानमंत्री यदि यह कहे कि "मुझसे नफरत है तो मेरे पुतले को जूते मारो" ....मुझे चौराहे पर खड़ा कर फांसी पर लटका देना... तो इससे उसकी वीरता की निशानी तो परिलक्षित नहीं होती। हां,कमजोरी और हताशा महसूस जरूर होती है।  जिन नरेंद्र मोदी और शाह की जोड़ी ने भाजपा को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनाकर देश के 22 राज्यों को जीतने का सुनहरा इतिहास रचा, आज उसी जोड़ी को जनता एक के बाद एक राज्यों में खारिज क्यों करने लगी? मोदी- शाह को इस बात पर आत्मचिंतन करना चाहिए। देश मे व्याप्त महंगाई, घटते रोजगार,महामंदी और आर्थिक संकट से भारत को उबारने के प्रयासों को छोड़कर केंद्र सरकार नोटबंदी, जीएसटी, ट्रिपल तलाक, धारा 370 , राम मंदिर को अपने कार्यकाल की महान उपलब्धियां बता अब नागरिकता कानून हिंदुस्तान की जनता पर जबरिया लादने की कोशिश कर रही है। सवा सौ करोड़ देशवासियों के अच्छे -बुरे का सोचने की बजाय हिंदू- मुसलमान में बांटकर सांप्रदायिक तनाव पैदा कर दिया गया है। कालेजों में पढ़ाई छोड़कर लाखों छात्र सड़कों पर आंदोलनरत हैं।

जिस नागरिकता कानून का भाजपा शासित राज्य असम, मिजोरम, नागालैंड,त्रिपुरा खुलकर विरोध कर रहे हैं फिर भी प्रधानमंत्री अकेले अपनी जिद पर अड़े हुए हैं। यह क्या जताने की कोशिश है ? यदि यह कानून केवल मुसलमानों को प्रभावित करने वाला है तो लाखों हिन्दू कोहराम क्यों मचा रहे हैं ?

 जिस लोकतंत्र के मंदिर (संसद भवन )की सीढ़ियों पर माथा रखकर प्रधानमंत्री ने पहली बार सदन में प्रवेश किया था, एनआरसी के मुद्दे पर वे सीना तान कर झूठ बोलते दिख रहे हैं। उन्हीं की सरकार के गृह मंत्री अमित शाह ने 2024 तक देश में एनआरसी (नागरिक रजिस्टर सूची) लागू करने की बात कही है । इतना ही नहीं अमित शाह ने तो यह भी स्पष्ट कहा है कि एनआरसी हिंदू और मुसलमान सब पर लागू होगा। जिनके पास वर्ष 1971 के पूर्व का दस्तावेज नहीं मिलेगा, उन्हें देश छोड़ना होगा। अमित शाह ने भारत सरकार के विशिष्ट पहचान पत्र आधार कार्ड तक को खारिज कर दिया। भाजपा को लगातार मिल रही पराजय से यह स्पष्ट होता है कि वह आज सिर्फ दो व्यक्तियों की पार्टी होकर रह गई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इतना मजबूर पहले कभी नजर नहीं आया जितना वह आज है। भाजपा के लिए वरदान बने मोदी अमित शाह आज उसी के लिए सबसे बड़ा खतरा बनते दिखाई दे रहे हैं ?

यदि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जिद का सिलसिला बना रहा तो आने वाले समय में पश्चिम बंगाल, बिहार और दिल्ली जैसे बड़े राज्य भी हार जाएंगे । राष्ट्रपिता महात्मा गांधी,भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल के योगदान को शून्य साबित करने की सनक कहीं भाजपा नेताओं को ही शून्य पर लाकर खड़ा न कर दें। क्या भाजपा को संविधान पर भरोसा नहीं है ? यदि है तो धार्मिक वैमनस्यता क्यों फैलाई जा रही है । धार्मिक प्रताड़ना को नागरिकता का आधार बनाना दुर्भाग्यपूर्ण है। कदाचित मोदी भी उसी ऐतिहासिक गलती की और अग्रसर हैं जो कभी पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को "इंदिरा इज इंडिया, इंदिरा इज इंडिया " बताकर की गई थी । इस नारे ने इंदिरा गांधी को हाशिए पर ला दिया था। हालांकि इंदिरा गांधी ने दोबारा वापसी कर ली परंतु मोदी ऐसा नहीं कर पाएंगे।  क्या कपड़ों से पहचान कर कारगिल युद्ध के योद्धा सब इंस्पेक्टर सनाउल्लाह को विदेशी घोषित कर डिटेंशन सेंटर भेजा गया है? यह शर्मनाक है। भारत मां की 30 साल निस्वार्थ सेवा करने वाले इस वीर के साथ ऐसा बर्ताव किया गया तो क्या यह माने कि यदि पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम जीवित होते तो उन्हें भी आज अपनी नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज देने पड़ते?  कपड़े देखकर नागरिकता नहीं दी जा सकती मोदी जी। अगर कपड़े देखकर कुछ करना ही है तो सबसे पहले स्वामी चिन्मयानंद, असीमानंद, साक्षी महाराज,  प्रज्ञा ठाकुर जैसे  लोगों के बारे में सोचिए।  पहले मुझे मोदी जी की धर्मनिरपेक्ष एवं गांधीवादी सोच पर संदेह होता था लेकिन नागरिकता कानून को लेकर जिस तरह का वातावरण बनाने की कोशिशें हो रही हैं, उससे अब विश्वास हो गया है कि वह एक सच्चे राष्ट्रवादी और देशभक्त चाहे होंगे मगर डर है कि कहीं विश्व के कई देश महामानव मोदी की तुलना हिटलर, सद्दाम हुसैन, ईदी अमीन, गद्दाफी जैसे तानाशाह शासकों से न करने लग जाएं?  

मोदी जी सौ जन्म भी  ले लें तो भी महात्मा गांधी के दर्शन और अमित शाह सरदार पटेल की बराबरी नहीं कर सकते।
 भारत पहले ही अपनी आबादी के बोझ तले दबा जा रहा है, ऐसे में बाहरी मुल्कों के लोगों को भारत में नागरिकता देने से रोजी -रोटी का संकट और बढ़ जाएगा। पहले हम अपनी तो धो लें। जरा सोचिए, देश को आजादी दिलाने वाले महापुरुषों ने भी यदि हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, बौद्ध, पारसी सोचकर स्वतंत्रता संग्राम लड़ा होता तो क्या आज हम गुलामी से आजाद होते ?

Source : (लेखक विजय शुक्ला देश के जाने मानें स्तम्भकार और विजय मत के प्रधान संपादक हैं।)