विजय शुक्ला

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के बारे में एक आम राय प्रचलित है कि वह अपने कमिटमेंट के बहुत पक्के हैं। उन्होंने यदि किसी बात के लिए दृढ़ निश्चय कर लिया तो उससे तिल भर भी पीछे नहीं होते। यूं तो मध्यप्रदेश में समय-समय पर अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारें बनती आई हैं । इन सरकारों ने जनता की भलाई के लिए अनगिनत प्रयास किए हैं मगर पिछले 20 वर्षों में जनता की जिंदगी से खिलवाड़ करने वाले असुरों के विरुद्ध पहली बार किसी सरकार ने कड़े इरादों और स्पष्ट नियत के साथ कदम आगे बढ़ाए हैं । वह है कमलनाथ सरकार।   पिछली सरकारों ने अपनी-अपनी तरह से भू-माफिया, ड्रग माफिया, माइनिंग माफिया पर नकेल कसने के प्रयास किए हैं लेकिन समय के साथ कार्यवाही पर विराम लग गया। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भू माफिया के खिलाफ असरदार कार्रवाई इंदौर में बॉबी छाबड़ा के खिलाफ की थी, उस कार्यवाही ने भूमाफिया और दलालों को हिला दिया था।


शिवराज ने विकास के कई आयाम भी रचे मगर कानून व्यवस्था ध्वस्त हो गई। थाने के अंदर घुसकर भाजपाई  टीआई की कॉलर पकड़कर अपराधियों को छुड़ाकर ले जाने लगे। रेत माफिया के हैसले इतने बुलंद थे कि आईपीएस अफसर नरेंद्र चौहान की हत्या कर डाली गई। व्यापमं जैसा ऐतिहासिक घोटाला, सिंहस्थ घोटाला, ई टेंडर घोटाला शिवराज के राज में हुआ। 13 साल मुख्यमंत्री के रूप में रिकॉर्ड दर्ज कर शिवराज ने जनता में अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल की लेकिन नौकरशाही के चंगुल में फंस गए।

यह बात कहने में कोई संकोच नहीं कि 15 साल भाजपा ने सरकार चलाई लेकिन माफिया राज जमकर फला फूला। उन्हीं के नेतृत्व में मध्य प्रदेश बलात्कार में नंबर वन प्रदेश भी बना। मप्र पर लाखों करोड़ का कर्ज लद गया क्योंकि सरकार उधार से कंबल ओढ़कर घी पी रही थी।
सत्ता परिवर्तन के साथ मप्र के मुख्यमंत्री कमल नाथ ने जिन विषम परिस्थितियों में कमान संभाली वह बेहद चुनौतीपूर्ण थी। सरकारी खजाना खाली। ऊपर से केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार। हर कदम पर नई रुकावट। वह कमलनाथ ही हैं जिन्होंने अपने बूते कांग्रेस की सरकार बनाई वरना असंभव था। कमल नाथ के लिए सबसे बड़ी चुनौती किसानों की कर्जमाफी थी। कमल नाथ मप्र के मुख्यमंत्री पहली बार बने लेकिन केंद्रीय मंत्री के तौर पर उनके दीर्घकालिक अनुभव ने कर्जमाफी का प्लान तैयार करने में उनकी मदद की। कर्जमाफी का दूसरा चरण चालू हो गया है। और विश्वास है कर्जमाफी का अक्षरसः वचन कमल नाथ निभाएंगे। एक साल के कार्यकाल में मुख्यमंत्री कमल नाथ ने बहुत बड़े फैसले किये हैं। विपक्ष को अचम्भा हो रहा है कि खजाना खाली है तो विकास योजनाएं चल कहाँ से रहीं हैं। एक साल के कार्यकाल मे कमल नाथ सरकार बेदाग है। कोई कलंक नहीं है। कमल नाथ ने मप्र से माफिया राज को जड़ से मिटाने का प्रण लिया है। यह प्रण अब से पहले कोई मुख्यमंत्री नहीं ले पाया। चाहे कोई भी क्यों न हो। माफिया राज खत्म कर डालने के निर्देश देकर कलेक्टरों से लेकर मुख्य सचिव को फ्री हैंड दे दिया गया है। मिलावटखोरी के खिलाफ सरकार पहले ही खुली जंग लड़ रही है। मप्र में हड़कंप मचा हुआ है। इंदौर में अखबार की आड़ लेकर काला कारोबार करने वाले व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई को अंजाम दिया गया। जिसे पत्रकारिता पर हमला बोला गया लेकिन असल मे यह मीडिया के मिलावटखोरों के विरुद्ध एक अभियान है । अखबार की आड़ लेकर आज ज्यादातर व्यापारी अपने घपले घोटाले दबाए हुए हैं। पत्रकारिता की आड़ में चल रही मिलावटखोरी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी ही चाहिए क्योंकि ऐसे लोगों से ही पत्रकारिता बदनामी झेल रही है।
 कमल नाथ जानते हैं कि मप्र की जनता माफिया राज से त्रस्त है, इसलिए हमला बोला गया। जनता सरकार के साथ खड़ी है। वह समर्थन कर रही है। इससे कांग्रेस सरकार का जनाधार तो बढ़ा साथ ही कमल नाथ पर  विश्वास कई गुना बढ़ गया है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज ने अपने स्वागत अभिनंदन समारोहों पर सरकार के अरबों रुपये फूँके। लेकिन कमल नाथ ने कोई तामझाम वाले आयोजन नहीं किये । मुख्यमंत्री के रुप मे एक साल पूर्ण करने का कार्यक्रम सादगी भरा था। जम्बूरी मैदान में सरकारी धन से भीड़ जुटाकर नहीं लाई गई।  कमल नाथ ने अफसरों की जवाबदेही ज्यादा तय की है। अफसरों पर जरूरत से ज्यादा निर्भर भी नहीं हैं। मप्र में पिछले 15 साल आद्योगिक विकास के नाम पर कागजी निवेश आया। सरकार के करोड़ों बर्बाद हुए मगर पहली बार मप्र में आद्योगिक निवेश का वातावरण हकीकत में दिखाई दे रहा है। छिदवाड़ा के विकास का मॉडल मप्र में नजर आएगा। हम कामना करते हैं। कमल नाथ 18 घण्टे काम करते हैं। विभागीय महकमे के साथ उनके अभिन्न सहयोगी आरके मिगलानी मप्र के विकास में मुख्यमंत्री के साथ दिन रात जुटे रहते हैं। मिगलानी की चर्चा यहाँ इसलिए करनी जरूरी है क्योंकि प्रशासनिक प्रबंधन के मामले में वे बेजोड़ हैं।  सुशासन के मामले में कमल नाथ का काम बोलता है। बचे हुए चार साल हैं, त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों का दौर है। लेकिन पंचायतों को सशक्त बनाने की जरूरत है। सबसे ज्यादा भ्रस्टाचार ग्राम तथा नगर पंचायतों में होता है। कमल नाथ  घोषणा वीर नहीं हैं आगे भी न बने तो अच्छा है। सरकार को बचे हुए चार साल में बुनियादी तौर पर काम करना चाहिए। सरकारी स्कूल,अस्पताल की सेहत सुधारनी होगी। निजी स्कूलों, कॉलेजों की मोनोपोली तोड़नी होगी।  बिजली बिल के बोझ से उपभोक्ताओं को राहत दी गई है मगर ग्रामीण अंचलों में निर्बाध आपूर्ति करनी होगी। आद्योगिक विकास में नई क्रांति लानी होगी तभी रोजगार बढ़ेंगे।