विजय शुक्ला
भारत के मतदाताओं ने 2019 के आम चुनाव में भाजपा को वोट राम मंदिर, ट्रिपल तलाक, कश्मीर, नागरिक संशोधन बिल के लिए  कम और यह सोच कर ज्यादा दिया था कि महंगाई घटेगी, रुपए और बेटियों की आबरू बचेगी, रोजगार के नए अवसर युवाओं के लिए बढ़ेंगे, आर्थिक तरक्की  के नए आयाम गढ़े जाएंगे । लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्राथमिकताएं शायद बदल चुकी हैं । पिछले 6 वर्षों में हमने इन्हें बदलते हुए देखा और महसूस किया है। रोटी, रोजगार और रुपया तथा विकास से जुड़े सवालों को करने वाला राष्ट्रदोही ठहराया जाने लगता है। सोशल मीडिया पर सवाल पूछने वालों पर कीचड़ उछालने के लिए एक पूरी फौज तैनात कर दी गई है जो व्यक्ति सत्ता से सवाल पूछे उसे ट्रोल कर दो और उसे इतना बदनाम कर डालो कि किसी को भी सच पर यकीन ही ना हो। फिर भी यदि वह ना माने तो इनकम टैक्स, प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई जैसी एजेंसियों को पागल कुत्ते की तरह उसके पीछे छोड़ दो। देश में एक पंथ, एक धर्म, एक विचारधारा जनमानस में थोपने की सनक ने गृहयुद्ध जैसा वातावरण निर्मित कर दिया है...!भारत में रहने वाले उत्तरी और दक्षणी राज्य नागालैंड, मिजोरम, मणिपुर आसाम, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश के लोग खुद को भारत से अलग नागरिक मानते हैं। उनकी संस्कृति  अलग है। वह सब गैर मुस्लिम या अल्पसंख्यक ही है। कोई भी प्रधानमंत्री उन राज्यों की जनता की मानसिकता को आज तक जब नहीं बदल पाया तो फिर कश्मीर में बंदूक और फौजी बूटों की दम पर लोगों की सोच कैसे बदल पाएंगे? भाई -भाई में फूट डालकर राज करने की नीति कहीं देश की अखंडता, सद्भाव को नष्ट करने वाली ना हो जाए.. यह चिंता का विषय है। सच्चाई यह है कि आज देश को मंदिर- मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च से अधिक सरकारी स्कूलों, अस्पतालों में काम करने वाले शिक्षक और डॉक्टरों की है। राष्ट्रवाद की सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब सभी धर्मों, प्रांतों के लोगों में मातृभूमि के प्रति आदर और संविधान के प्रति विश्वास बढ़ेगा। संविधान की मूल भावना के खिलाफ जाकर भारत का भला हरगिज नहीं होने वाला। पड़ोसी देशों से आने वाले गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देना भी कहां की बुद्धिमानी है ? इससे तो केवल राजनीतिक स्वार्थ की रोटियां ही  सिंकेंगी। समंदर में जहाज डूबने लगे तो कहते हैं कि पड़ोसी को बिठाना नहीं चाहिए, फिर चाहे वह अपना सगा भाई ही क्यों ना हो। जो ऐसा करता है वह उसे मूर्ख माना जाता है। भारत में बढ़ती जनसंख्या के समुद्र में भारत का शक्तिशाली जहाज भी डूब रहा है। इस पर नियंत्रण के लिए चीन, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, की तरह कड़े कानून बनाने चाहिए। मुसलमानों, हिंदुओं, बौद्धों, पारसी सबको भारत के संविधान के नियमों का पालन करना चाहिए। यूपी को छोड़कर बाकी हिंदी भाषी राज्यों में भाजपा की सत्ता जा संभवतः इसलिए वह मतदाताओं को हिंदू- मुस्लिम में बांटने का नाटक कर रही है। भाजपा जानती है कि उसका जनाधार खिसक रहा है इसलिए अल्पसंख्यकों को भारत का मतदाता बनाकर 10 प्रतिशत वोट बैंक बढ़ाना उसका लक्ष्य है।  सिख, ईसाई बौद्ध को कोई भी एक धर्म स्वीकारने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इतिहास साक्षी है कि जिस सनकी पागल तानाशाह ने अपने देश को तुगलकी फरमान से चलाने की जिद की, वह मिट गया। जर्मनी का तानाशाह हिटलर हो या युगांडा का क्रूर शासक ईदी अमीन या फिर चाहे लीबिया का गद्दाफी हो या इराक का सद्दाम हुसैन,  यह सभी वह नाम है जिन्होंने अपने देश की जनता पर तानाशाही बर्ताव कर अनैतिक दवाब बनाये, अपनी विचारधारा जबरन थोपी। लेकिन कुत्ते की मौत मारे गए।

दक्षिण कोरिया का तानाशाह किम जोंग कभी भी निपटा दिया जाएगा। एक धर्म, एक संस्कृति वाला कोई भी राष्ट्र खुशहाल नहीं है। सब ग्रहयुद्ध की आग में जल रहे हैं। अनेकता में एकता की महान संस्कृति के कारण ही भारत में विश्व गुरु बनने की शक्ति है। हिंदू राष्ट्र बनकर नेपाल ने क्या कर लिया ?  इस्लामिक राष्ट्र बनकर पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, ईरान, इराक आज कितने खुशहाल हैं जो हिंदू राष्ट्र बनने पर हम हो जाएंगे ? हिंदू.. हिंदू और सिर्फ हिंदू राग अलापने से यदि रुपए की की इज्जत लौट आए... आर्थिक विकास दर बढ़ जाए, युवाओं को हर साल दो करोड़ रोजगार मिलने लगें, हर भारतीय के खाते में पंद्रह लाख रुपए आ जाएं,  गरीबी खत्म हो जाए , बैंक डूबने से बच जाएं , लुटेरे  विजय माल्या, मेहुल चौकसी, ललित मोदी और अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम को पकड़कर सरकार भारत ले आए और यदि भारत को यूएन में स्थाई सदस्यता यदि मिल जाए तो बेशक अपना देश हिंदू राष्ट्र बन जाए वरना संघीय ढांचे और संविधान से अपने निजी स्वार्थ के लिए खिलवाड़ न किया जाए। एकाधिकार लिए देश को हिंसा नफरत की आग में झोंकने की जिद तानाशाह हिटलर ने की थी कहीं वैसी ही गलती प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी न कर बैठे ?

Source : (लेखक विजय शुक्ला देश के जाने मानें स्तम्भकार और विजय मत के प्रधान संपादक हैं।)