विजय शुक्ला 
 
मप्र के सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले 16 शिक्षकों के खिलाफ स्कूल मप्र सरकार के काबिल शिक्षा मंत्री प्रभुराम चौधरी की मंशा पर की गई अनिवार्य सेवानिवृत्त की कार्रवाई ने एक नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। इस कार्रवाई के बाद प्रदेश भर के शिक्षकों में अपने भविष्य को लेकर भय का वातावरण बन गया है। विद्यार्थियों के भविष्य के निर्माता जब अपने ही भविष्य को लेकर घबराने लगे तो यह बात गंभीर हो जाती है। कम्पलसरी रिटायरमेंट को लेकर पूरे प्रदेश के शिक्षकों में बहस शुरू होना स्वाभाविक है। परन्तु इस गति की प्राप्ति के लिए मंत्री नहीं बल्कि शिक्षक दोषी हैं, जिन्होंने अध्ययन अध्यापन कार्य को तिलांजलि दे दी। स्कूल शिक्षा मंत्री प्रभुराम चौधरी एक संवेदनशील, गंभीर, बुद्धिमान और पढ़े लिखे मंत्री हैं, इसलिए बहुत सोच विचार के बाद मास्टरों को घर भेजने का निर्णय लिया होगा। मंत्री प्रभुराम ने बताया कि ये वे शिक्षक हैं जिन्हें दो बार परीक्षा में 33 प्रतिशत अंक लाने के लिए किताबें तक दे दीं गई लेकिन नकल करके भी पास न हो सके। सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता को सुधारने की दिशा में मंत्री प्रभुराम काफी चिंतित नजर आते हैं। वे स्कूलों का लगातार निरीक्षण कर समस्याओं से रूबरू हो रहे हैं। यथायोग्य समाधान भी दे रहे हैं। मगर दशकों से चरमराई व्यवस्था को एकदम से तो सुधारा नहीं जा सकता। मंत्री की कोशिशों की सराहना होनी चाहिए। मेरा यह मानना है कि मप्र में पहली बार  मप्र के 52 सरकारी विभागों में स्कूल शिक्षा विभाग कदाचित अकेला ऐसा विभाग है जहां बिना लेनदेन के ट्रांसफर हुए हैं। करीब 70 हजार शिक्षकों के संविलियन में एक पाई खर्च नहीं हुई और शिक्षकों को मनचाही पदस्थापना मिल गई। कमलनाथ सरकार के खाते में यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। वरना बाकी विभागों में तो ट्रांसफर उद्योग चल रहे हैं...!  प्रभुराम चौधरी को इसके लिए बधाई मिलनी चाहिए। प्रभुराम चौधरी जिस अभियान में जुटे हैं वह आसान नहीं है। पूर्ववर्ती सरकारों ने सरकारी स्कूलों की सुध ली होती तो क्या बात थी।  हालत यह है कि मप्र के सरकारी स्कूलों की सेहत सालों से वेंटिलेटर पर पड़ी हुई है,जिसमें प्राणवायु डालने के प्रयास मंत्री प्रभुराम चौधरी ने तेज कर दिए हैं। सरकारी स्कूलों की शैक्षणिक गुणवत्ता चौपट है। सरकार इसलिए शिक्षक पात्रता परीक्षा समय समय पर  आयोजित करती है ताकि शिक्षक की बौद्धिक एवं शैक्षणिक दक्षता को जांचा परखा जा सके। 16 शिक्षकों को अनिवार्य घर बिठाने का निर्णय कहाँ तक उचित है,इस सवाल को जानने के लिए सबसे पहले अविभावकों की जवाबदेही तय करना बहुत आवश्यक है। क्योंकि तभी सरकार की मंशा साकार हो सकती है। मगर,देखने मे आता है कि कोई भी सरकार अविभावकों की जवाबदेही तय नहीं कर पाई। मप्र गठन से लेकर आज तक इस गंभीर विषय की अनदेखी की गई। यदि शिक्षकों के साथ साथ अविभावकों की जवाबदेही तय कर दी जाए तो सरकारी स्कूलों की शैक्षणिक गुणवत्ता में क्रांतिकारी सुधार किए जा सकते हैं। इस जटिल विषय को हमे इस तरह समझने की जरूरत है। दरअसल, सरकारी स्कूलों में अध्यापन कार्य की मॉनिटरिंग होनी चाहिए और इसके लिए सरकार को चाहिए कि वह उड़नदस्ते गठित करे। क्वॉलिटी ऑडिट हो।  मासिक मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार हो। ताकि स्कूलों की स्थितियों का समय समय पर पता चल सके। दूसरा शिक्षकों से गैर शिक्षकीय कार्य पर पूर्णतः प्रतिबंध लगाया जाए। मतदाता सूची सर्वे , पशु जनगणना आदि बेगारी के काम उनसे न करवाये जाएं। इस कार्य को करने के लिए अलग से संस्था हो। या निर्वाचन आयोग देखे। अकुशल शिक्षकों के विरुद्ध की गई सख्त कार्रवाई उचित है परंतु अविभावकों के खिलाफ भी करवाई होनी चाहिए। प्रायः देखा जाता है कि सरकारी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन के लिये अविभावक अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं। उस मध्यान्ह भोजन की तैयारी में दो से तीन घंटे बर्बाद हो जाते हैं। चूल्हे की लकड़ियां सुलगाते सुलगाते आधे बच्चे स्कूल से गायब हो जाते हैं। मध्यान्ह भोजन की जितनी निंदा करें वह कम पड़ जाएगी। सरकार को इस सिस्टम में कसावट लाने की जरूरत है। बच्चों को ढंग से मींन्यु के मुताबिक मप्र के एक स्कूल में भोजन नहीं मिलता यह सच है। स्कूलों की गुणवत्ता में सुधार के लिए सरकार ग्रामीण क्षेत्र में विशेष अभियान चलाकर माता-पिता को प्रेरित करे कि वे हर हाल में बच्चे को स्कूल भेजें। और फिर भी यदि बच्चा स्कूल न आये तो अविभावक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए। उन गैरजिम्मेदार लापरवाह माता-पिता के नाम गरीबी रेखा से काट दिए जाएं और सस्ता या मुफ्त मिलने वाली हर सुविधा से अविभावक को वंचित कर दिया जाए। तभी अविभावकों को शिक्षा के महत्व का पता चलेगा। केवज वजीफा, मुफ्त ड्रेस और साईकल के लिए बच्चों के नाम रजिस्टर पर दर्ज न किये जायें। शिक्षको पर यह दवाब न डाला जाए कि वे माता-पिता से बच्चे को स्कूल भेजने के लिए हाथ जोड़ें। प्रधानमंत्री आवास, मुफ्त बिजली जैसी योजनाओं का लाभ भी ऐसे अविभावकों को कतई न दिया जाए। सरकारी स्कूलों में भी निजी स्कूलों की तर्ज पर "पैरेंट्स टीचर मीट" बुलाई जाए। यदि इन उपायों पर सरकार गौर फरमाती है और कड़ाई से लागू करती है तो इसके अच्छे परिणाम निश्चित आएंगे। शिक्षक पालक संघ की प्रांसगिकता तय की जाए जो केवल कमाई का जरिया तक सीमित हैं। शैक्षणिक गुणवत्ता में सुधार करना है तो केंद्र और राज्य सरकारों को ये उपाय अपनाने चाहिए। निजी स्कूलों पर नकेल कसनी होगी। केवल शिक्षकों के खिलाफ इकतरफा कार्रवाई करने से चौपट व्यवस्था नहीं सुधारी जा सकती। गुणवत्ता में गिरावट के लिए शिक्षक से अधिक अविभावक जिम्मेदार हैं। शिक्षक तो स्कूल पढ़ाने जाता है मगर बच्चे ही नहीं आते। इस मामले में शिक्षकों की गड़बड़ी भी सामने आती है कि वे रजिस्टर में दस्तखत करके गायब हो जाते है। शिक्षकों के रिक्त पदों को भरा जाए। कुलमिलाकर शिक्षक अपने कर्तव्यों का नैतिकता, ईमानदारी से पालन करें। सरकार अकेले इन्हें "बलि का बकरा" न बनने दे।
Source : (लेखक विजय शुक्ला देश के जाने मानें स्तम्भकार और विजय मत के प्रधान संपादक हैं।)