विजय शुक्ला
देश के जाने-माने उद्योगपति और स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी के खासुलखास रहे जमनालाल बजाज के नाती राहुल बजाज ने एक कार्यक्रम में गृहमंत्री अमित शाह से सीना तानकर जो बात कह दी उसे कहने की हिम्मत 6 साल से कोई उद्योगपति ना कर सका। राहुल बजाज ने उद्योग जगत की पीड़ा को सबके सामने रखते हुए दो टूक कहा कि देश में डर का ऐसा माहौल है कि कोई उद्योगपति सच कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है । राहुल बजाज की रगों में स्वाधीनता संग्राम सेनानी जमुनालाल बजाज का खून दौड़ता है इसलिए उन्हें सच कहने में नफा -नुकसान की चिंता नहीं है वरना देश का वातावरण कुछ ऐसा हो गया है कि केंद्र सरकार के खिलाफ कोई खुलकर बोलने को तैयार नहीं है। भले ही उद्योग कारोबार का भट्टा बैठ जाए। हाल में आई दूसरी तिमाही की  4.5 % विकास दर देश में छाई आर्थिक महामंदी के असर को बताती है। जीडीपी(विकास दर) के आंकड़े प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 5 ट्रिलियन डॉलर इकानमी के दावे पर सवाल उठा रहे हैं और पूछ रहे हैं कि जब भारत महामंदी की खाई में गिर पड़ा है, हर क्षेत्र में इसका जबरदस्त असर है उद्योग जगत भयभीत है तो 5 ट्रिलियन इकॉनमी कहां से लाएंगे ? प्रधानमंत्री के पास जादू की छड़ी भी नहीं है और ना ही अलादीन का वह जादुई चराग ही है जिसे रगड़ने से  देश की जीडीपी आठ से दस प्रतिशत हो जाये। साल भर से आर्थिक मंदी की खबरें आ रही हैं लेकिन केंद्र सरकार इस सच को स्वीकारने से भागती रही है और अब महामंदी की सुनामी जब हमारे सिर पर आकर मंडराने लगी तब सरकार कहने लगी है कि यह वैश्विक मंदी का असर है जो भारत पर पड़ रहा है । सच तो यह है कि सरकार का फोकस आर्थिक  मजबूती, रोजगार सृजन, गरीबी मिटाने, किसानों को खुशहाल बनाने के प्रयासों से कहीं अधिक वोट बैंक बढ़ाने के राजनीतिक उपायों पर केंद्रित है। तीन तलाक, कश्मीर में धारा 370 हटाना और राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या देश की आर्थिक सेहत में  सुधार ला पाएगा ?  देश की जनता पर अवांछित जीएसटी कानून थोपा गया नोटबंदी की गई मगर यह केंद्र सरकार के लिए आत्मघाती  साबित हो रही है। नोटबंदी से देश के युवाओं , किसानों बेरोजगारों को क्या फायदा हुआ ?  रोजगार बढ़ने की बजाय तेजी से घट रहे हैं। बेरोजगारी सुरसा के मुंह की तरह फैलती जा रही है । टैक्स रिफॉर्म के नाम पर शुरू किए गए प्रयास "टैक्स टेररिज्म" की तरह डरा रहे हैं । राज्य सरकारें  रो रही हैं कि उनके टैक्स कलेक्शन का हिस्सा उन्हें नहीं लौटाया जा रहा। आरबीआई से केंद्र सरकार को 1.60 लाख करोड़ लेना क्या आर्थिक समृद्धि की निशानी है ? दरअसल, यह वैश्विक मंदी का नहीं बल्कि केंद्र सरकार के ऊटपटांग फैसले का असर है  इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र सरकार वैश्विक मंदी का रोना-धोना बंद कर मंदी से निपटने के उपायों पर तत्परता से विचार करें वरना 5 ट्रिलियन इकॉनमी मुंगेरीलाल  के हसीन सपने बनकर रह जाएगी। देश के कर्ताधर्ताओं को यह समझ जाना चाहिए कि उनके अहंकारी स्वभाव के कारण एक-एक कर राज्यों से भाजपा की सत्ता की शक्ति जा रही है। महाराष्ट्र के परिणाम देश की राजनीति की नई दिशा तय करने वाले माने जा रहे हैं। भाजपा को अपने ही नेताओं के विरोध का सामना आने वाले दिनों में जरूर करना पड़ेगा। राम मंदिर करोड़ों हिंदुओं की आस्था का मामला है, वहां मंदिर निर्माण होना चाहिए परंतु जनता को सोचना पड़ेगा कि राम, रोटी और रोजगार तीनों की देश को जरूरत है। बैंकों का दिवाला निकल चुका है। गिने-चुने उद्योगपतियों को छोड़कर बाकी दिवालियेपन की तरफ हैं। एक तरफ चंद उद्योगपतियों का 13 लाख करोड़ कर्ज माफ कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ जनता पर  टैक्स वसूली का दबाव बना रहे हैं । इनकम टैक्स के अफ़सर गब्बर सिंह बनकर घूम रहे हैं। राहुल बजाज के सवाल का जवाब अमित शाह ने देश के तमाम उद्योगपतियों की मौजूदगी में कहा कि किसी को डरने की जरूरत नहीं है और यदि डर का माहौल है तो उसे मिलकर ठीक करने के प्रयास करेंगे यह कड़वा सच है कि मौजूदा सरकार को आलोचना पसंद नहीं है हमेशा अपनी सरकार की आलोचना के लिए मीडिया पर नाराजगी जाहिर करते रहते हैं वैसे मैं बता दूं कि मुझे सवाल करने में डर नहीं लगता हम किसी से डरने वाले भी नहीं है डंके की चोट पर सच लिखते रहेंगे और जिम्मेदारों से सवाल पूछते रहेंगे रही बात सच बोलने वाले बजाज साहब की तो खुदा खैर करे....।
 
Source : लेखक विजय शुक्ला देश के विख्यात युवा पत्रकार और विजय मत के प्रधान संपादक हैं।