प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अंतर्मन से चाहे कौड़ी भर न सुहाते हों मगर मानना पड़ेगा कि  मध्यप्रदेश के मीडिया को मामा शिवराज का क्रेज खूब सुहा रहा है । मानो शिवराज सिंह चौहान आज भी मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और कांग्रेस विपक्ष में है।  13 साल राज्य के मुख्यमंत्री रहे शिवराज ने प्रदेश की माताओं,बहनों और जीजाओं, भांजियों को अपनी तरफ बांधे रखने में पीएचडी कर रखी है तो टीवी चैनल और अखबारों में कैसे रोजाना छपना है इस मामले में भी उनकी काबिलियत एमफिल की डिग्री से कम नहीं है । मुख्यमंत्री कमलनाथ का समाचार टीवी चैनलों अखबारों पर एक बार छपने से रह भी जाए मगर शिवराज के मामले में ऐसा नहीं होता। साल भर से विपक्ष में होने पर भी मीडिया मैनेजमेंट के मामले में भाजपा आगे है । पीसीसी मुख्यालय से लेकर जनसंपर्क और उससे भी आगे सीएम सचिवालय में बैठे लोगों को यह फर्क क्या दिखाई देता है ? अगर देता है तो क्या उनकी ओर से इस दिशा में कोई ठोस प्रयास हुए ?  दरअसल, मुख्यमंत्री कमलनाथ के सलाहकारों ने मध्यप्रदेश के चंद टीवी चैनलों और प्रसार संख्या में अव्वल दिखाने वाले समाचार पत्रों को से गठबंधन कर यह मुगालता पाल रखा है कि मध्यप्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता के असली ठेकेदार बस यही  5-6 न्यूज़ चैनल और 5-6 अखबार ही है । मतलब, इन्हें यदि खुश रखा जाए तो बाकियों का कोई अस्तित्व ही नहीं है। कई बार ऐसे मौके आए जब जनसम्पर्क  के इन्हीं चहेते टीवी चैनलों और अखबारों ने भाजपा के पक्ष में खुलकर खड़े होकर कांग्रेस सरकार की बैंड बजा डाली। मगर उन्हें इसके लिए किसी ने भी रोकने की कोशिश तक नहीं की।  मैग्नीफिसेंट मध्यप्रदेश के आयोजन के बहाने जनसंपर्क विभाग ने जिन चैनलों और चुनिंदा अखबारों को करोड़ों रुपयों के विज्ञापन दिलवाए और आयोजन में शामिल होने के लिए फाइव स्टार सुविधाएं मुहैया कराई, उन्होंने सरकार के इस आयोजन का वैसा कवरेज नहीं किया, जितना सरकार को अपेक्षा रही होगी। जब व्यक्ति को दृष्टि दोष हो जाता है तो उसे छोटे लोग बड़े और बड़े लोग छोटे दिखने लगते हैं । मुझे लगता है इसी दोष से जनसंपर्क विभाग और कांग्रेस का मीडिया विभाग शायद ग्रसित है।  एक खास तरह के वर्ग और मीडिया से कांग्रेस का मीडिया विभाग प्रभावित है और बाकियों से उसे कोई लेना देना नहीं है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष न बनने दें मगर मीडिया का 70 फ़ीसदी वर्ग धीरे-धीरे उनके खिलाफ होता जा रहा है। उन्हें कोई तसल्ली देकर मनाने वाला भी नहीं है। कई बार सोचा कि इस गंभीर विषय से परहेज रखा जाए मगर 15 साल कांग्रेसियों का सत्ता के लिए घनघोर संघर्ष देखने के बाद आज सच्चाई से सरकार को अवगत कराना जरूरी है। बल्लभ भवन की पांचवी मंजिल पर 15 से 18 घंटे दिन रात काम करने वाले मुख्यमंत्री तक कांग्रेसियों और आमजनों की पीड़ा पहुंचे। कांग्रेसियों का दर्द उन तक पहुंचे, जिन्हें उनके मंत्रियों ने अछूत सा बना लिया है । उन्हें तो पूर्ववर्ती भाजपा सरकार में मंत्रियों के स्टॉफ से मतलब है क्योंकि गंगा में डुबकी लगवाने का उन्हें अच्छा अभ्यास है।  नाथ सरकार  को सारी खूबियां पूर्व सरकार में बड़े पदों पर रहे अफसरों तथा मंत्रियों के स्टाफ में ही आखिर क्यों नजर आती है,  यह तो वही जाने मगर इनके कारण कांग्रेस कार्यकर्ता और नेताओं के बीच गहरी खाई खुद चुकी है। आप कह सकते हैं कि ये स्टॉफ भाजपा सरकार की  मन्थराएं हैं जो फोकट में ही कांग्रेसी सरकार के गले पड़ गई हैं।  जनसंपर्क विभाग की जिम्मेदारी है कि वह सरकार की लोकप्रियता को जन-जन में बढ़ाने के लिए  प्रयास करे लेकिन इस विभाग की दशा इन दिनों शेयर बाजार जैसी हो गई है। जहां देखो वहां भाव ताव की चर्चा होती रहती है।  ईमानदार पत्रकार लगनशील कलमकार, मेहनत से अखबार निकाल रहे पत्रकारों से जनसंपर्क विभाग को गंध आती होगी नहीं तो चुनिंदा लोग ही इस विभाग के कृपा पात्र कैसे बने रहते?  केंद्र में बैठी मोदी सरकार देश के अखबारों को मौत के घाट उतारने पर आमादा है लिहाजा मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के पास मौका है कि वह मध्यप्रदेश के मध्यम, लघु अखबारों की रक्षा के लिए कृष्ण बनकर आगे आएं। रही बात देश के चुनिंदा टीवी चैनलों और कारोबारी उद्योग पतियों के अखबारों की तो उन्होंने तो अपनी दुकान, धंधों को ढकने के लिए यह उपाय कर रखे हैं। ऐसे लोग किसी के सगे ना आज हैं और ना कल ही होंगे। देश मे डिजिटल इंडिया की केवल बात हो रही है लेकिन डिजिटल मीडिया को महत्व नहीं मिल रहा। बेवसाइट चलाने वाले पत्रकारों की जांच करना चाहते हैं,करिए मगर साल भर से प्रताड़ना का क्या मकसद है? आउटडोर मीडिया जो मीडिया नहीं है में पोस्टर होर्डिंग्स लगाने की सनक से कुछ नहीं होने वाला।  मुख्यमंत्री के लिए इतना इशारा काफी है । उन्हें समय रहते नाजुक हालातों को समझ लेना चाहिए । मुख्यमंत्री अपने सलाहकारों और मीडिया का खुद को ठेकेदार समझने वाले लोगों से यह भी कहें कि वे पांचवीं मंजिल से उतरकर कभी कभार सड़के भी देख लिया करें। नगरीय निकाय और पंचायत चुनावों पर इसका असर न पड़े इसलिए उपाय करने होंगे। मुख्यमंत्री उदार और समझदार दोनों हैं,इसलिए उनसे बेहतरी की आशा है। पत्रकारों के लिए सीएम हाउस के दरवाजों को खुला रखना चाहिए। इससे लोकतंत्र स्वास्थ्य ठीक होगा। पत्रकारों से संवाद जितना बढ़ेगा सरकार को ग्राउंड रिपोर्ट उतनी ही मिलेगी वरना अफसरों की पोल कैसे खुलेगी।जनसम्पर्क विभाग अपने विभाग के मंत्री पीसी शर्मा की आंखों में धूल झोंककर उन्हें अंधेरे में ही रखना चाहता है। मीडिया प्रबंधन के मामले में पीसी शर्मा को महारत हासिल है। विपक्ष में रहते हुए पीसी शर्मा को मीडिया ने जमकर तवज्जो दी। अब बारी मंत्री जी की है कि वो संघर्षों में साथ निभाने वाले मीडियासंस्थानों,पत्रकारों को कितनी मदद कर पाते हैं। मीडिया को दलों में बांटने की नहीं दिल से साथ जोड़ने की जरूरत है। और यह काम कैसे होगा पीसी शर्मा से बेहतर कोई और नहीं जानता। अखबारों को मिटाने पर तुली केंद्र सरकार अपना अहंकार त्यागे , होश में आये। राज्य सरकारें जिद छोड़कर हिन्दी पत्रकारिता को बचाएं।
(लेखक देश के वरिष्ठ पत्रकार और विजय मत के एडिटर इन चीफ हैं। )