दुनिया में इन दिनों बिटकॉइन शब्द की चर्चा हो रही है । वर्ष 2009 से शुरू हुई बिटकॉइन की चर्चा बाजारों का नया भविष्य कही जा रही है ,जिसे लेकर कई देश चिंतित हैं तो कई विचलित ।ऑस्ट्रेलिया में इसे मान्यता मिल चुकी है। बिटकॉइन अर्थात आभासी मुद्रा, जिसका भौतिक स्वरूप नहीं होता मगर गणितीय प्रारूप इंटरनेट पर होता है। माना जा रहा है कि आने वाले कुछ वर्षों में बिटकॉइन यानी क्रिप्टोकरंसी को भारतीय बाजार में आरबीआई उतार सकता है यानी भारत की अर्थव्यवस्था क्रिप्टोकरंसी पर बहुत कुछ निर्भर हो जाएगी। आरबीआई इस करेंसी को फिलहाल इसलिए मान्यता नहीं दे रहा है क्योंकि इस करेंसी का मनी ऑर्डर, चेक, डीडी के रूप में प्रयोग नहीं हो सकता। यह कैसे हो, इस पर गुण- दोष का अध्ययन फिलहाल किया जा रहा है। क्रिप्टो करेंसी को अर्थ तंत्र में आई नई क्रांति माना जा रहा है। रुपए आपके खाते में होंगे पर आप उन्हें कभी न छू पाएंगे ना उन्हें नोट के रूप में देख पाएंगे । सिर्फ कंप्यूटर, मोबाइल पर देखकर ही अपने अकाउंट का आभास कर सकेंगे । दुनिया के कई देशों में बिटकॉइन की मांग बढ़ रही है। एक बिटकॉइन की कीमत 2.60 लाख के बराबर है। यह मुद्रा भ्रष्टाचार को रोक पाने में कितना कारगर है, इस पर शोध नहीं हो पाया है मगर रूस चीन जैसे बड़े देश इसके खिलाफ हैं । भारत भी है।  अपने देश का विकास भी बिटकॉइन (आभासी) जैसा ही है । आप विकास का आभास करिए लेकिन भौतिक (धरातल) में इसे देखने की मत सोचिए । कुलमिलाकर आप आभास कीजिए कि हम मंगल ग्रह पर रह रहे हैं । हमारे खाते में 15 लाख रुपए आ गए हैं। मेट्रो रेल गली मोहल्लों में दौड़ रही है। देश मे रोजगार ही रोजगार हैं ।कोई भी बेरोजगार देश में नहीं है ।उद्योग जगत मौजूदा सरकार से खुश है। तरक्की ही तरक्की चारों दिशाओं में हो रही है। किसी भी उद्योगपति ने बैंकों से करोड़ों रुपए कर्ज लेकर देश नहीं छोड़ा है । विजय माल्या मेहुल चोकसी जैसे भगोड़े इस देश में थे ही नहीं। भारत में महंगाई बिल्कुल नहीं है और ना ही मंदी की वजह से कोई सेक्टर प्रभावित ही है ।आप सिर्फ आनंद ही आनंद में हैं। इसी बात का आभास करते जाइए।  भारत में महंगाई, रुपए की गिरती कीमत जैसी कोई समस्या नहीं है बल्कि हमारा रुपया डाला और दिनार से 10 गुना हो गया है। क्रिप्टो डेवलपमेंट (आभासी विकास)  जी हां ,जो आंखों को दिखाई तो देगा,लेकिन केवल कल्पनाओं में।  मौजूदा केंद्र सरकार भी यही चाहती है कि हम आभासी विकास की चकाचौंध में फंसे रहे। कोई सवाल न करे। बस यही सोचे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आजाद भारत के पहले सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री हैं और उनसे बेहतर भविष्य में भी कोई होने वाला नहीं है। यह भी सोचते रहिए किवर्तमान  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, पंडित अटल बिहारी बाजपेई से बढ़कर हैं। उनसे बड़ा देशभक्त कभी धरती पर पैदा ही नहीं हुआ। चंद्रशेखर आजाद,भगत सिंह,राजगुरु, अशफाक, रामप्रसाद बिस्मिल,सुभाष चंद्र बोस के बलिदान के कारण नहीं बल्कि सावरकर, आरएसएस और मोदी के कारण देश आज सुरक्षित और आजाद है।  उन्हीं के कारण हमें दुनिया में नाम और इज्जत मिल रही है।  ऐसा ही सुखद आभास आप जितना चाहे कर सकते हैं लेकिन वह धरातल पर आपको दिखाई नहीं देने वाला है।  
 
 
आप आभास कीजिए कि हमें कोई समस्या नहीं है । कश्मीर में रामराज है । देश में भी राम राज्य है और ऐसे ही विकास की आभासी तस्वीर में आप खोए रहिए। केंद्र सरकार बस यही चाहती है इस बात का आभास हम करें कि आरबीआई को कोई संकट नहीं है ।हमारे बैंक पूरी तरह सुरक्षित है । अकाउंट भरे हुए हैं । एक भी बैंक मंदी के कारण बंद नहीं हुआ है और हमारा देश तरक्की के रास्ते पर बहुत तेजी से बढ़ता जा रहा है। यह आभास आप करते रहिए चाहे तो यह भी आभास कर ले कि हमारा देश अब हिंदू राष्ट्र बन गया है। 
 
भारत में पिछले 6 वर्षों में जो कुछ भी हुआ है वह सब इससे पहले कभी नहीं हुआ। यह तमाम आभास है जिनकी कल्पनाओं में आप चाहे तो डूबे रह सकते हैं लेकिन सच्चाई इससे उलट है । देश की दिशा और दशा दोनों बहुत चिंताजनक है । लेकिन एक बड़ा वर्ग नहीं चाहता कि भारत की जनता हकीकत की तस्वीर से रूबरू हो और वह यह जाने कि पिछले 6 वर्षों में हमारा भारत देश गहरी खाई में जा चुका है। यह भी सच्चाई है कि विकास के जो दावे केंद्र की सरकार कर रही है उसमें कोई दम नहीं है , फिर "सबका साथ और सबका विकास " कहां गायब हो गया ?  तो हम आपको बताते हैं। दरअसल विकास तो अब सिर्फ एक नारा है सत्ता में बने रहने का। बाकी सब टीवी चैनलों पर तमाशा है ताकि आप अंधभक्त बने रहें। वही देखें जो देश के बड़े चंद टीवी चैनल आप को दिखाना चाहते हैं और देश के टीवी चैनल्स आपको वही दिखाएंगे, जिसकी स्क्रिप्ट पीएम हाउस से तैयार कर उनके पास भेजी जाएगी। टीवी  पत्रकार वही बोलेंगे जो बोलने के लिए कहा जाएगा। और हां आप वही सवाल पूछेंगे, जिसका जवाब देने में सरकार को कोई दिक्कत नहीं होगी। आप यह नहीं पूछेंगे की पुलवामा में सीआरपीएफ के जवान क्यों मारे गए ? आप यह नहीं पूछ सकते कि आर्थिक मंदी से देश में रोजगार क्यों छीन रहे हैं ? आप यह नहीं पूछ सकते देश के विकास का पहिया कहां ठहर गया है ? दरअसल, भारत के न्यूज़ चैनल न्यूज़ चैनल नहीं रह गए बल्कि सरकारी भोंपू हो गए हैं ।उनकी अपनी कोई दृष्टि नहीं है। अपनी कोई आवाज नहीं है.. अपना कोई विचार नहीं है.. अपना कोई मुद्दा नहीं है। इसके पीछे की वजह है कि इन चैनलों ने केंद्र सरकार से इतना धन अर्जित कर रखा है कि उनकी हिम्मत नहीं है कि वह केंद्र सरकार के शान के खिलाफ एक शब्द भी बोलने की जुर्रत कर सकें ! जो ऐसा करते हैं उनके विज्ञापन बंद कर दिए जाएंगे । उनके मालिकों को फसाने के लिए सीबीआई, ईडी या इनकम टैक्स विभाग पीछे छोड़ दिये जाएंगे। तब भी बात नहीं बनी तो उस चैनल को बंद कराने का इंतजाम शुरू कर दिया जाएगा । इंदिरा गांधी की इमरजेंसी देश के लिए काला दिन थी है और रहेगी। मगर हम यह ना भूले की वर्तमान परिदृश्य में देश की हालत जैसी बना दी गई है वह भी अप्रत्यक्ष तौर पर एक तरह का अघोषित आपातकाल ही है ! और यदि हम सरकार से सवाल पूछेंगे तो मोदी भक्त हमें देशद्रोही ठहराने का प्रयास तेज कर देंगे । यह विडंबना है कि इस देश का नेतृत्व जिस योग्य ताकतवर राजनेता के हाथ में है, उसके सलाहकार इस देश का बंटाधार कराने पर तुले हुए हैं। जो अखबार सच लिखना चाहेंगे उनके विज्ञापन बंद कर दिए जाएंगे। हमारा विज्ञापन भी डेढ़ साल बंद किया गया है, लेकिन मैं सच लिखना और सवाल पूछना बन्द नहीं कर सकता। विपक्ष की भूमिका में रहकर सच के लिए कलम चलाना हमारा धर्म है, और जिनकी नजर में यह राष्ट्रद्रोह है, वे मुझे राष्ट्रद्रोही कहते रहें कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।