राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी की 150वीं जयंती को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ,उसकी अनुयायी भाजपा और उसके सर्वे सर्वा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उत्साह पहली बार देखते ही बनता है। आजादी के बाद देश में ऐसी गांधी लहर  इससे पूर्व कभी नहीं देखी गई जिसमें कांग्रेस के साथ भाजपा भी सवार हो। सरदार वल्लभ भाई पटेल जी के नाम को अपना बताने में सफल रही भाजपा का अगला एजेंडा यही है कि जिन महात्मा गांधी जी के नाम पर कांग्रेस पार्टी की सांसें चल रही हैं और जिन गांधीजी के नाम पर कांग्रेस का दिल धड़कता है क्यों ना उसे भी छीन लिया जाए। आप यह जान लें कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा को महात्मा गांधी जी के राष्ट्रपिता कहे जाने पर अक्सर आपत्ति रहती है ! समय-समय पर उसके नेता सवाल उठाते रहते हैं कि भारत राष्ट्र तो प्राचीन काल से अस्तित्व में है फिर महात्मा गांधी जी को राष्ट्रपिता कैसे कहा जा सकता है ? उन्हें ज्यादा से ज्यादा आप राष्ट्रपुत्र कह सकते हैं । गांधी जी के विचारों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं भाजपा कितना इत्तेफाक रखती है यह तो वही जाने मगर वर्ष 2014 से लेकर अनवरत गांधी जी का बिना लेंस वाला चश्मा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान का अहम हिस्सा जरूर बना हुआ है। गांधीजी के प्रति आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ) और भाजपा की आस्था पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। उन्हीं सवालों का समाधान भाजपा द्वारा मनाई जा रही गांधी जयंती की संकल्प यात्रा है। आरएसएस की हमेशा से कोशिश रही है कि वह किसी तरह देश की जनता को यह समझाने में सफल हो जाए कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बहुत सम्मान करते थे। वैसे मेरी राय में गांधी जी की 150वीं जयंती मनाने का एक बेहतर रास्ता यह हो सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी केंद्र सरकार के विज्ञापनों में साल भर उनकी फोटो लगाकर भी श्रद्धा प्रकट कर सकते हैं लेकिन उन्हें या उनके सलाहकारों को यह बात अब तक नहीं सूझी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को इस पर आपत्ति भी क्या होनी चाहिए?  वह तो इनदिनों खुद महात्मा गांधी के नाम की माला जप रहा है। महात्मा गांधी जी के प्रति श्रद्धा आस्था प्रदर्शित करने का एक बड़ा अवसर प्रधानमंत्री पहले ही गवा चुके हैं। वे चाहते तो महापुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल जी की तरह महात्मा गांधी जी की विशाल गगनचुंबी प्रतिमा का अनावरण स्टेचू ऑफ यूनिटी की तर्ज पर कर सकते थे ?  इससे पूरी दुनिया में भाजपा ,आरएसएस के गांधी के प्रति सम्मान का संदेश जाता। आखिर गांधीजी भी तो उसी गुजरात में जन्मे हैं जहां से सरदार पटेल आते हैं । कांग्रेस के शरीर में गांधीजी के डीएनए को समाप्त करने वाला यह एक सफल परीक्षण भाजपा चाहती तो कर सकती थी लेकिन उसने सरदार वल्लभभाई पटेल को चुना । गांधी जी की 150वीं जयंती के बीच राष्ट्रवाद का मुद्दा भी अचानक गरम हो गया है। पिछले दिनों गांधी जी की जयंती के अवसर पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी की 150 वीं जयंती को लेकर संघ प्रमुख मोहन भागवत का एक अखबार में पहले पन्ने पर छपा साक्षात्कार यही दिखाने की कोशिश थी कि आरएसएस का नजरिया महात्मा गांधी के प्रति बहुत गहरा सद्भाव पूर्ण है।  मोहन भागवत देश की जनता को इस साक्षात्कार में भी यह यकीन कराने की कोशिश करते नजर आए कि गांधीजी संघ का सम्मान करते थे। तो सवाल उठता है कि विश्व की सबसे बड़ी पार्टी का दावा करने वाली भाजपा जिसके पास नरेंद्र मोदी जैसा करिश्माई नेतृत्व हो और बहुमत हो वह गांधी जी पर अपना अधिकार जमाने का प्रयास आखिर क्यों कर रही है ? तो इसका सीधा जवाब है क्योंकि जैसे ही गांधी की छवि हमारे सामने उभर कर आती है वैसे उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे भी हमें दिखता है । गोड़से राष्ट्रीय स्वयं संघ का प्रचारक था.... जिसने बाद में राष्ट्रीय हिंदू महासभा की सदस्यता ग्रहण की थी। गोडसे के संघी होने या ना होने पर बहुत विवाद है हालांकि नाथूराम गोडसे के भाई गोपाल गोडसे ने बहुत बाद में साफ कर दिया था कि गोडसे संंघ को अपना परिवार मानता था और गांधी जी की हत्या के दाग आरएसएस के दामन पर न पड़े इसलिए उसने संघ से जुड़ने की बात छिपाई ताकि राष्ट्रीय स्वयं संघ की मुश्किलें न बढ़े। संघ के राष्ट्रवाद पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा उठाए गए सवाल पर मोहन भागवत ने अपना रुख स्पष्ट किया है। मोहन भागवत कहते हैं -"भारत का राष्ट्रवाद हिटलर और मुसोलिनी के राष्ट्रवाद से अलग है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद लोगों को डराता है क्योंकि लोग इसे हिटलर मुसोलिनी से जोड़ते हैं यह राष्ट्र अपनी साझा संस्कृति से बना है । "  राष्ट्रवाद को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। कोई एक व्यक्ति, संगठन, वर्ग, धर्म या राजनीतिक दल राष्ट्रवाद का ठेकेदार कैसे हो सकता है ?आज का राष्ट्रवाद वर्ग विशेष के अधिकारवादी होने का बोध कराता है। मोहन भागवत जिस राष्ट्रवाद की चर्चा करते हैं क्या वह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद के राष्ट्रवाद से मेल खाती है ? क्या संघ और भाजपा राष्ट्रवाद की एक नई परिभाषा गढ़ना चाहते हैं, जिसमें हिंदू राष्ट्र की भावना सबसे ऊपर नजर आती है। भारत के राष्ट्रीय एकात्म को मजबूत करने का कार्य एकमात्र हिंदू धर्म ने किया है, यह कहना पूर्ण सत्य नहीं है । इस राष्ट्र में मीर उस्मान अली जैसे राष्ट्रवादी भी रहे हैं , जिन्होंने 1962 में 5 टन सोना  पूर्व प्रधानमंत्री  लाल बहादुर शास्त्री  जी को  भारत की  रक्षा के लिए  दे दिया था ।  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  अमीर उस्मानी  को  राष्ट्रवादी भले ना माने  लेकिन  देश के लिए उनका योगदान  एक सच्चे राष्ट्रवादी होने का  उदाहरण है । महात्मा गांधी का राष्ट्रवाद समावेशी राष्ट्रवाद था । यही कारण है कि उनके जनआंदोलनों में हर वर्ग, धर्म ,संप्रदाय जातियों के पुरुष और महिलाएं बढ़-चढ़कर बराबरी से शामिल हुआ करते थे। गांधीजी का राष्ट्रवाद समग्र मानवतावाद से ओतप्रोत था, जिसमें उदारवादी दृष्टिकोण था और सबके लिए  सम्मान था । राष्ट्रवाद को मजबूती तभी मिलेगी जब इसमें जन जन की भागीदारी हो । संघ प्रमुख मोहन भागवत कहते हैं भारत हिंदुओं का देश है, इससेे तो गांधीजी का समग्र मानवतावादी समावेशी राष्ट्रवाद बिलकुल मेल नहीं खाता।  स्वामी विवेकानंद का राष्ट्रवाद आध्यात्मिक है ।उन्होंने कहा कि मैं भारतीय हूं और प्रत्येक भारतीय मेरा भाई है । जबकि आरएसएस का राष्ट्रवाद हिंदुत्व और हिंदू धर्म को सर्वाधिक महत्व देता है । पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का राष्ट्रवाद को लेकर कहना था कि- "राष्ट्रवाद एक सियासी धर्म है जो पुरुषों के दिलों में अंतर्निहित अपेक्षाओं को झकझोर देता है और इसके साथ ही उन्हें सेवा करने तथा आत्म बलिदान करने के लिए प्रेरित करता है । " संघ हिंदू राष्ट्रवाद को ज्यादा मानता है ! हालत यह है कि भाजपा और संघ से गांधीजी ना निगलते बन रहे हैं और ना छोड़ते ही बन रहे। जिस दिन भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और उनकी हत्यारे नाथूराम गोडसे में से किसी एक को चुन लेगा राष्ट्रवाद का मुद्दा भी स्वयं हल हो जाएगा । समता न्याय और परस्पर सम्मान राष्ट्रीयता की मूल अवधारणा है। राष्ट्रवाद इसी में बसता है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर्व को भाजपा ने सरकार में रहते हुए सरकारी विज्ञापनों में साल भर फोटो लगाकर  याद किया था तो गांधीजी में क्या बुराई है ?  कांग्रेस ने भी गांधी जी के लिए कुछ खास ऐसा नहीं किया जिसका उल्लेख किया जा सके वह तो गांधी के नाम पर देश पर राज करती रही है।  जिन सरदार पटेल ने अपने जीवन में कभी 1 इंच जमीन अपने नाम पर नहीं खरीदी, उनके नाम पर स्टेचू ऑफ यूनिटी पर 6000 करोड़ रुपए प्रतिमा निर्माण में खर्च किया जाना क्या उनकी आत्मा को रास आएगा ? बेहतर होता यदि इस पैसे को जनकल्याण में खर्च किया जाता। गांधीजी तो अपने दम पर जिंदा है और हमेशा जनता के दिलों में जिंदा रहेंगे।

(लेखक विजय शुक्ला देश के जाने-माने युवा क्रांतिकारी पत्रकार हैं। यह लेख
बात कहूँ खरी-खरी से कॉलम से लिया गया है। )