देश में तेजी से पनप रही एक गंभीर समस्या पर लिखने की आवश्यकता महसूस हुई है। पहले सोचा कि इस बारे में राजनेताओं की भांति नो कमेंट की मुद्रा ले चुप रहूं लेकिन चुप्पी साधने से इस समस्या के आत्मघाती होने का खतरा और बढऩे की कुशंका लगने लगी है। लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कही जाने वाली पत्रकारिता मुश्किल में हैं। विशेषकर प्रिंट मीडिया तो गंभीर मुश्किल में दिखाई देने लगी है। यदि इसे बचाने के प्रयास जल्द शुरू नहीं किए गए तो अनर्थ हो जाएगा। यहां अनर्थ का आशय पत्रकारिता समाप्त होने का नहीं बल्कि उसके संवाहक अखबारों के भविष्य से जुड़ा है। पता नहीं सरकारों को मीडिया से कौन सा बैर है, जो उसका वजूद मिटाने पर तुली हुई हैं। पत्रकार जगत को दुश्मन की नजरों से देखकर उसे क्षति पहुंचाने का कुचक्र पिछले कुछ वर्षों में और तेज हो गया है। भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण विभाग के अधीन डीएवीपी विभाग प्रिंट मीडिया के पर कतरने पर लगा हुआ है। बड़े चुनिंदा अखबारों को छोड़कर बाकियों का हुक्का-पानी यानी विज्ञापन बंद कर दिया गया है। गंभीर आर्थिक चुनौतियों से जूझ मीडिया जगत की हालत इनदिनों नाजुक दौर से गुजर रही है। यह जानकर भी सरकारों का कलेजा पत्थर बना हुआ है। आखिर इतना बेरहम होना क्या उचित है? क्या सरकारों ने प्रिंट मीडिया को रसातल में पहुंचाने का प्रण ले रखा है? प्रिंट मीडिया कुछ सालों से आर्थिक मंदी के बीच कारोबारी दबाव का सामना कर रहा है ऐसे समय पर घरेलू कागज उद्योगों की आड़ में केंद्र सरकार ने बजट में आयात शुल्क को दस प्रतिशत बढ़ाने का निर्णय लिया। यह किसी अन्याय से कम नहीं । प्रिंट मीडिया के विज्ञापनों में लगातार कटौती कर जुल्म ढाया जा रहा है। ऐसा जुल्म तो इंदिरा गांधी सरकार में थोपे गए आपातकाल तक में नहीं देखा गया। 190 साल का सफर तय कर चुकी हिंन्दी पत्रकारिता का गौरवशाली इतिहास रहा है, जिसका सामना अंग्रेजों से खूब हुआ लेकिन पत्रकारिता ने डंटकर उनका मुकाबला किया। लेकिन हारी नहीं, टूटी नहीं। हिन्दी पत्रकारिता को खत्म करने की साजिशें लगातार जारी है। अंगे्रजी अखबारों के साथ हिन्दी पत्रकारिता की प्रतिस्पर्घा दशकों पुरानी है। लोग कहते थे कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के आने से प्रिंट मीडिया समाप्त हो जाएगा। लेकिन उसकी विश्वसनीयता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज भी सुबह की शुरूआत हर घर में अखबार से होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में यानी आधे से अधिक भारत में आज भी अखबारों की मान्यता बहुत गहरी है। फिर भी उसे मिटाने का प्रयास हो रहा है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की जो दुर्गति आज हो रही है, उसके लिए चौथा स्तंभ ही जिम्मेदार है। न वो खुद को चौथा स्तंभ मानता और न ही बाकी के तीन स्तंभों की तरह उस पर बदनामी का कलंक ही लगता। पत्रकारिता वह रथ है जिसे अखबार रूपी पहिए दौड़ाते हैं। सरकारें इन्हीं पहियों को पंचर रखना चाहती हैं। ताकि पत्रकारिता पंगु होकर रह जाए। प्रिंट मीडिया के सामने इलेक्ट्रानिक मीडिया के बाद सोशल मीडिया ने चुनौती पेश की और अब डिजिटल मीडिया एक नई चुनौती बनकर आया है लेकिन मेरा दावा है कि चाहे जैसी भी चुनौतियां आएं मगर प्रिंट मीडिया कभी समाप्त नहीं होगा। वह और विश्वसनीय बनकर उभरेगा। केंद्र की तर्ज पर क्या कांगे्रस शासित राज्यों की सरकारें भी प्रिंट मीडया का गला घोटना चाहती हैं? लोकसभा चुनाव में मिली शर्मनाक हार का बदला अखबारों से लेना निंदनीय है। यदि वाकई सरकार ऐसा सोचती हो। मीडिया के धैर्य का बांध अब दरकने लगा है। क्या मुगलों का शासन है या इसे हिटलरशाही कहा जाए? प्रिंट मीडिया से जुड़े कुछ साल के अनुमानित आंक ड़े कंपा देने वाले हैं। इनके अनुसार विगत चार वर्षों में देशभ्र के डेढ़ लाख से अधिक अखबार दम तोड़ चुके हैं। इस हिसाब से आंकलन करें तो इन अखबारों में काम करने वाले तकरीबन साढ़े तीन लाख से अधिक लोग अब तक बेरोजगार हो चुके । आश्चर्य की बात है कि पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने वाले लोग प्रिंट मीडिया की नाजुक हालत पर एक शब्द बोलने को तैयार नहीं हैं। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की सरकारें केंद्र के पीछे चल पड़ी हैं। मीडिया को कौन से अपराध की सजा दी जा रही है भला ? राजनीतिक दलों में मीडिया को बांटना कतई उचित नहीं है। नौसिखिए मीडिया घरानो ने सत्ता की आरती उतारने का सिलसिला जिस दिन से शुरू किया उसी दिन से मीडिया का पतन चल पड़ा। इससे हमारा कल्याण हो भी लेकिन पत्रकारिता का नाश ही होगा। इसलिए नई पीढ़ी के नौजवानों को अपना गोत्र गिरवी रखने से बचना चाहिए। मीडिया के प्रति सरकारों का दृष्टिकोण कसाई जैसा हो गया है। बजट की कमी का रोना रोकर अखबारों के विज्ञापन बंद कर दिए गए हैं। कांगे्रस सरकार ने धारणा बना ली है कि पूर्ववर्ती सरकार ने करोड़ों के विज्ञापन लुटाए फिर भी सत्ता नहीं मिली और हमने बिना विज्ञापन सरकार बना ली। लेकिन सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि 15 सालों के संघर्ष में इसी मीडिया ने मुफ्त में विपक्ष को जनता में जिंदा बनाए रखा था। विज्ञापन देकर सरकार कोई अहसान नहीं करती बल्कि अखबारों का सहयोग करती है और बदले में उनका सहयोग लेती है। माना कि जनसंपर्क विभाग से पूछकर कोई अखबार शुरू नहीं करता तो क्या यज्ञ, पूजा, कथा आदि आयोजन पूछकर थोड़े होते हैं। ऐसे ही जन जागरण, लोककल्याण के उद्येश्य को सामने रख अखबार निकाला जाता है। यह सामाजिक धर्म है इसलिए सरकारों को इनका सहयोग करना चाहिए। मप्र इकलौता ऐसा राज्य रहा है जहां की सरकारों का मीडिया के प्रति सहयोगात्मक नजरिया काफी उदारता पूर्ण सदैव रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री रहे अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह, शिवराज सिंह चौहान के राज में मीडिया को बहुत ताकत मिली। इसलिए मप्र की कमल नाथ और छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार पूर्ववर्ती संस्कृति को आगे बढ़ाए। पत्रकारिता को मजबूती तभी मिलेगी जब अखबारों को सरकारी सहयोग मिलेगा। क्योंकि कारपोरेट घराने पत्रकारिता करने वाले अखबारों को सहयोग क्यों करना चाहेंगे ? विशुद्ध रूप से पत्रकारिता को सशक्त बनाने की दिशा में मुख्यमंत्री कमल नाथ निश्चत रूप से बेहतर सोच रखना चाहेंगे। अखबारों की आड़ में धंधा करने वालो को भी रोकना जरूरी होगा ताकि उन्हें हक मिले जो वास्तविक हकदार हैं। मप्र और छत्तीसगढ़ सरकार लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को ढहने से बचा सकती है। और उसे यह काम अवश्य करना चाहिए। मुख्यमंत्री कमल नाथ मीडिया के प्रति बड़ी उदारता बरतेंगे ?
 महाकवि मैथलीशरश गुप्त के शब्दों से-

 हम कौन थे, क्या हो गए, और क्या होंगे अभी
आओ विचारें आज मिलकर यह समस्याएं सभी

Source : लेखक विजय शुक्ला देश के जाने माने युवा पत्रकार एवं विजय मत के प्रधान संपादक हैं।