वैश्विक जल संकट के बीच भारत के नीति आयोग ने वर्ष 2018 की जो रिपोर्ट पेश की है वह दिमाग हिल आने वाली है।  रिपोर्ट में कहा गया है कि 2020 तक देश के 21 प्रमुख शहरों में जमीन के नीचे का पानी खत्म हो जाएगा। तेजी से बढ़ रही आबादी वाले भारत  के लिए यह रिपोर्ट गंभीर खतरे की चेतावनी है। जनसंख्या वृद्धि के उच्चतम स्तर को छूने का गर्व दुनिया के सामने हमे शर्मसार कर रहा है।  पीने का साफ पानी न मिल पाने से हर साल दो लाख लोग जान गंवा   रहे हैं । नीति आयोग की रिपोर्ट में जिन शहरों में जलस्तर खत्म होने की ओर कहा गया है, उनमें नई दिल्ली, अमृतसर, जालंधर, पटियाला, लुधियाना, मोहाली, यमुना नगर ,गाजियाबाद, आगरा, जयपुर, हैदराबाद, गांधी नगर, बेंगलुरु, वेल्लोर,बीकानेर, चेन्नई के अलावा मध्य प्रदेश का इंदौर और रतलाम शामिल है। रिपोर्ट बताती है कि जल संरक्षण की दिशा में आजादी के बाद से लेकर अब तक यानी लगभग 73 वर्षों में सरकारों के प्रयास उल्लेखनीय नहीं रहे। भूजल स्तर को बढ़ाने के लिए कितने लाख करोड़ खर्च कर दिए गए मगर पानी का स्तर की घटता ही चला जा रहा है। पीने का पानी  मिल पाना आने वाले समय में और कठिन हो जाएगा । ऐसी स्थिति में सरकार से ज्यादा जिम्मेदारी प्रत्येक नागरिक की बनती है कि वह पानी की एक बूंद भी व्यर्थ ना बहने दे । पानी की सबसे अधिक बर्बादी सार्वजनिक स्थलों जैसे सुलभ कांप्लेक्स, स्कूल, सिनेमा, थिएटर ,रेलवे स्टेशन पर होती है । लाखों लीटर पानी फिजूल बहा दिया जाता है और नल की टोटी खराब होने से पानी बहता जाता है। हमे यदि एक घूंट पानी की आवश्यकता है तो फिर एक गिलास पानी क्यों फेंक देते हैं ? इस पर विचार करना पड़ेगा । नीति आयोग की रिपोर्ट जल संरक्षण के लिए चलाई जा रही उन तमाम योजनाओं की पोल खोलने वाली है, जिन पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है। तालाबों, बांध, नलकूप का संवर्धन हमने नहीं किया। पेड़ों को काटते चले गए, प्रकृति का अनमोल अमृत यानी जल के जीवन को जान न सके। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम अभी से पानी की बचत करनी शुरू कर दें। दफ्तरों में पानी की बोतलों की बजाय आधा गिलास पानी कार्यक्रम चलाया जाए। सरकारी दफ्तरों में, विधानसभा, लोकसभा, राज्यसभा जैसी संवैधानिक संस्थाओं को इस मामले में आगे आकर पहल करनी चाहिए । तभी पीने का पानी बचेगा और बोतल बंद पानी पर होने वाले व्यय की बचत होगी। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमल नाथ "आधा गिलास जल, सवांरे कल " अभियान की अनूठी  शुरूआत करें तो इससे बड़ा संदेश जाएगा। विधानसभा अध्यक्ष, प्रमुख विभागों के सचिव,सरपंचों विधायक एवं सांसदों को आधा गिलास पानी, सुखद जिंदगानी का नारा बुलंद कर इसे नए आंदोलन में तब्दील करना चाहिए । स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रमों में जल संरक्षण के पाठ्यक्रम शामिल करने होंगे । अंधाधुंध ट्यूवेल की खुदाई पर अंकुश लगाना होगा। वनों की अवैध कटाई करने वालों के खिलाफ हत्या के समान गंभीर धाराएं लगाई जाएंगी तो शायद भविष्य में इसके सुखद परिणाम मिलने लगेंगे । जल प्रबंधन एवं नियंत्रण मिशन शुरू करने होंगे। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नाम पर जलग्रहण मिशन चलाया गया था, जिसके परिणाम भी आने लगे थे लेकिन बाद में यह मिशन महज घोटाला मिशन बनकर ही रह गया। सरकारों को चाहिए कि वे प्रत्येक जिला स्तर पर पेयजल नियंत्रण एवं संरक्षण समिति बनाकर इसमें निजी लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करें ताकि आने वाली पीढ़ियों को हमारे पापों की सजा भुगतनी ना पड़े।
 मध्य प्रदेश सरकार ने पानी का अधिकार कानून बनाया है लेकिन वह तभी सफल होगा जब उसके क्रियान्वयन में गंभीरता बरती जाए। मुख्यमंत्री कमलनाथ देश के ऐसे पहले मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने पानी का अधिकार कानून लाने का साहस दिखाया है । लेकिन ध्यान रहे यह कानून कहीं राइट टू एजुकेशन, राइट टू इनफार्मेशन, राइट टू फूड जैसा ही बन कर न रह जाए । जहां लोगों को अच्छी शिक्षा, अच्छा भोजन नसीब नहीं हो रहा है। हमें चेतने की आवश्यकता है। क्योंकि यदि हम पानी की बूंद को सहेजने के लिए आज से गंभीर नहीं हुए तो आने वाली पीढ़ी एक गिलास पानी के लिए तो क्या एक बूंद पानी के लिए भी तरसेगी। जरा सोचिए यदि जल नहीं होगा तो हमारा कल क्या होगा ?

(लेखक विजय शुक्ला मप्र के वरिष्ठ पत्रकार, इतिहासकार हैं)