पत्रकार/मालिक/संपादकों को विवि में कुलपति का पद, सूचना आयोग में आयुक्त का पद, ईसी मेम्बर, सरकारी मकान, जमीन , महंगे विज्ञापन चाहिए।  इसलिए मंत्री-अफसरों की आरती उतारने और उनकी भाँठगीरी में लगे रहते हैं तो फिर पत्रकारिता कहां से होगी ? इसलिए कोई भी ठुल्ला टाइप का नेता औकात पूछने लगता है। इसमें गलत क्या है ? नेता सही कहता है क्योंकि उसने पत्रकारों की सच्चाई जान ली है। उसकी औकात देखी है। वह जान चुका है कि पत्रकार का इरादा खबर कम अपना काम निकलवाना ज्यादा है। किसी पत्रकार /मालिक को दलिया का ठेका चाहिए तो किसी को सरकारी विभागों में मटेरियल सप्लाई का ठेका, किसी को नमक की फैक्ट्री के लिए जमीन तो किसी को रेलवे का टेंडर या सड़क निर्माण का टेंडर चाहिए। कोई शराब कारोबार को बचाने के लिए अखबार निकाल रहा है तो कोई गुटखा और रियल स्टेट बिजनेस को सुरक्षित रखने के लिए अखबार निकाल रहा है। कोई पत्रकार ट्रांसफर -पोस्टिंग की दलाली के लिए अखबार निकालता है तो किसी को पत्रकार इसलिए बनना है कि उसकी झांकी बनी रहे। दुकानदारी चलती रहे। किसी को सोसाइटी बनाकर सरकार से जमीन लेनी है तो किसी को राशन दुकान का लाइसेंस चाहिए। कोई पत्रकार इसलिए है कि रेत की खदान में अनाप-शनाप डम्फर दौड़ाते रहें। किसी को अखबार इसलिए चलाना है कि घपले घोटालों के कारण जेल की हवा खानी न पड़े।  क्या इन लोगों को पत्रकार प्रोटेक्शन एक्ट देना चाहिए ? इन हालातों में बेचारी पत्रकारिता का दम तो घुटेगा ही। मालिकों की भूख की कोई सीमा ही नही है। पत्रकार को पगार देंगे 5 हजार और बेगारी के काम करवाएंगे 10 हजार। 10 हजार रूपट्टी के बदले पत्रकार का हर तरह का शोषण होता रहे कोई बोलने वाला नहीं है। बच्चों को पालना है तो मालिक की हुकुम बजानी पड़ेगी। जिसे पत्रकारिता की एबीसीडी नहीं मालूम वो अपने आप को फन्ने खान समझता है। ऐसे लोगों के कारण भी पत्रकारिता की दुर्गति हो रखी है। कोई युवा पत्रकार आंखों में विशुद्ध पत्रकारिता करने का सपना भला कैसे देख पायेगा जब उसका मालिक उसे पत्रकार कम दलाली की ट्रेनिग अधिक दिलवाएगा। अफसर- नेताओं के पैर छुएंगे माँ-बाप के चाहे कभी न छूते हों। जब पत्रकार मंत्रियों का पिछलग्गू होकर घूमेगा तो पत्रकारिता कैसे करेगा। सरकार और नेता हमारी कमजोरियों का फायदा उठाकर अपमानित करते रहेंगे यदि हम अपनी आदतों से बाज नहीं आये। सरकारी विभागों में सिर्फ बुराइयां देखने की पत्रकारिता अधिक होने लगी है। या फिर जो हो रहा है होने दो हमे हर हफ्ता कमीशन दो की आदत डाल ली है। अपना मोल भूल बैठे तो कोई इज्जत कहां से देगा ? महात्मा गांधी जी, लाला लाजपत राय जी, प्रभाष जोशी जी, राहुल बारपुते जी,राजेन्द्र माथुर जी सरीखे महान लोग भी तो पत्रकार थे उनके पास करोड़ो की संपत्ति क्यों नहीं आई ? क्योकि ये पत्रकारिता के तपस्वी और संत थे।  पत्रकारिता मिशन थी  और हमेशा रहेगी बस नजरिया बदलता रहेगा। पत्रकारों की पूरी बिरादरी गंदी नहीं है कई लोग अभी भी हैं जो ईमानदारी और सच्चाई के साथ डंके की चोट पर कलम चलाकर सर कलम होने की चिंता नहीं करते। वे शेर की तरह गरजते हैं। उनके सवालों का सामना आज भी पीएम नरेंद्र मोदी जी अमित शाह जी जैसे ताकतवर नेता नहीं कर सकते। क्योंकि उनका कोई निजी एजेंडा नहीं है। मीडिया जगत की बदनामी का कारण हम हैं। आज अखबार या चैनल जनता या पाठकों की पसंद न होकर राजनीतिक पार्टी या नेता की पसंद हो गए हैं। खबर की बजाय एजेंडा होता है। इसलिए तो उद्योगपति भी चैनलों के मालिक बन गए ताकि सरकार की सेवा करके तिजोरी भर सकें। इसलिए अपनी तो यही सलाह है  पत्रकारों को पत्रकारिता का मूल्य समझना होगा ।

(लेखक विजय मत ग्रुप के प्रधान संपादक हैं। मप्र के कई प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में संपादक रह चुके हैं। )