महान राजनीतिज्ञ के. कामराज को आज की पीढ़ी नहीं जानती। यदि वह उनके बारे में जान ले तो राजनीति का आधा ककहरा खुद-ब-खुद आने लग जाए। देश की राजनीति में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के भविष्य को लेकर बहुत सारी बातें हो रहीं हैं। लोकसभा की हार ने कांग्रेस अध्यक्ष को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया। इसलिए के कामराज को याद करना आवश्यक है।  बात उस दौर की है जब 1963 में चीन से युद्ध हारने के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अपनों और विरोधियों के निशाने पर आ गए थे । विपक्ष के तेज तर्रार नेताओं आचार्य कृपलानी, राम मनोहर लोहिया, श्यामा प्रसाद मुखर्जी  जैसे नेताओं के हमलों के कारण वे इतने दबाव में थे कि कांग्रेस पार्टी लगातार तीन लोकसभा उप चुनाव हार गई। कांग्रेस पार्टी पर घोर संकट छा गया था । और तब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे कुमारास्वामी कामराज,जिन्हें के. कामराज के नाम से अधिक जाना जाता है, ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर सबको चौंका दिया था। कामराज ने यह कहते हुए मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया कि पार्टी संगठन कमजोर पड़ रहा है इसलिए वे मुख्यमंत्री की जगह प्रदेश अध्यक्ष बन कर काम करना चाहते हैं ।
के कामराज के बताए हुए मार्ग पर कांग्रेस का कोई नेता आज क्या चलने की सोच सकता है ? कांग्रेस के खंड खंड टूटने और रसातल में जाने की मुख्य वजह यही है कि कोई भी नेता संगठन की सेवा नहीं करना चाहता । पल भर में मुख्यमंत्री की कुर्सी को ठोकर मारने वाले  कामराज के सामने दो बार  प्रधानमंत्री बनने का अवसर भी आया, लेकिन उन्होंने इस अवसर को भी ठोकर मार दी।  जीवन भर संगठन के लिए कार्य करते रहे। वह राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे। कामराज के इस्तीफे की योजना नेहरू को खूब पसंद आई ।उन्होंने कामराज के इस प्लान को देश भर में लागू किया । इसी योजना के कारण 6 राज्यों के मुख्यमंत्रियों और कई कैबिनेट मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा था। मोरारजी देसाई, लाल बहादुर शास्त्री , बाबू जगजीवन राम ,एसके पाटिल, ने इस्तीफे दिए । इस्तीफे देने वाले मुख्यमंत्रियों में
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री भगवंतराव मंडलोई, उड़ीसा के बीजू पटनायक भी शामिल थे।  राहुल गांधी ने कांग्रेस के उतार-चढ़ाव और संघर्षों के इतिहास का थोड़ा सा अध्ययन कर लिया होता तो आज उन्हें अध्यक्ष पद से त्यागपत्र नहीं देना पड़ता । और महज 18 महीने में गांधी खानदान के पहले नकारा पार्टी अध्यक्ष भी वे नहीं कहलाते । लेकिन अब तो सब लुट चुका है । कांग्रेस पार्टी बूढ़ी होकर मरणासन्न अवस्था को प्राप्त हो चुकी है। इसके लिए राहुल गांधी सर्वाधिक दोषी हैं क्योंकि कांग्रेस के भगवान होकर भी वे पार्टी संगठन के लिए कुछ खास नहीं कर पाए। राहुल गांधी अपनी पार्टी के भीतर ऐसा एक भी के कामराज नहीं तलाश पाए, जिसके लिए संगठन सर्वोपरि हो। यहां तो संगठन को संकट में छोड़कर अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, कमलनाथ,वी नारायणसामी, कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री पद पर डटे हुए हैं।  याद होगा अध्यक्ष बनने से पहले राहुल कांग्रेस के जिस सिस्टम को बदलने के दावे किया करते थे, वे उसे तो नहीं बदल सके उल्टा सिस्टम ने उन्हें घर पर बिठा दिया। राहुल गांधी ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं की भावना को कभी समझा ही नहीं वरना आज इस गति को प्राप्त नहीं होते । वह अपने पतन का कारण स्वयं है।राहुल यह भूल गए कि
आरएसएस की जिस विचारधारा  के खिलाफ लड़कर वे उसे मिटाना चाहते हैं, वह मिटने वाली नहीं है। नेहरू और इंदिरा गांधी ने भी ऐसा ही चाहा था, लेकिन वह हार गए । बाद में इंदिरा ने आरएसएस को साथ लेकर कई अहम फैसले तक लिये थे। सच्चाई यह है कि आज कांग्रेस खुद अपनी विचारधारा भूल गई है। कम्युनिस्ट या सोशलिस्ट नेताओं ने कांग्रेस की विचारधारा को बुरी तरह जकड़ रखा है। तो क्या अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद कांग्रेस में सब कुछ ठीक-ठाक हो जाएगा। बिल्कुल नहीं। बल्कि गैर गांधी व्यक्ति को पार्टी अध्यक्ष बनाने से कांग्रेस के टूटने का खतरा और अधिक बढ़ जाएगा। दरअसल, गांधी परिवार यदि किसी गैर गांधी को अध्यक्ष बनाने की सोचता भी है तो उसे वह तोता चाहिए जो सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अहमद पटेल की हां में हां और ना में ना मिला कर बात करे।  कांग्रेस संगठन का इससे क्या भला होगा ? मोतीलाल वोरा, शीला दीक्षित, मनमोहन सिंह, सुशील कुमार शिंदे ,एके एंटोनी, गुलाम नबी आजाद, जैसे बुजुर्ग नेताओं को पार्टी की कमान सौंपने पर विचार हो रहा है मगर देश की आधी आबादी को इन नेताओं के बारे में कुछ नहीं मालूम।  फिर इन्हें अध्यक्ष बनाने से क्या लाभ हासिल होगा ? ये बोझ ही बनेंगे। राहुल गांधी हमेशा नई कांग्रेस खड़ी करनी चाहते थे लेकिन उन्होंने कितने राज्यों में  प्रदेश अध्यक्ष युवाओं को बनाया ? भारतीय जनता पार्टी का सिद्धांत संगठन के मामले में कांग्रेस से कहीं ज्यादा बेहतर और सुदृढ़ है।  प्रधानमंत्री बनने से पहले  नरेंद्र मोदी ने 75 वर्ष का नियम बनाकर कई नेताओं को घर बैठा दिया था ताकि नए ऊर्जावान युवाओं को आगे की पंक्ति में खड़ा करके संगठन को मजबूती दी जा सके। उन्होंने 75 के फार्मूले को बड़ी सख्ती से लागू किया। जिसका परिणाम आज सबके सामने है। भाजपा दूसरी बार भारी बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता पर तन कर बैठी है । उसने नया नेतृत्व तैयार किया है।  नरेंद्र मोदी ने जब अमित शाह को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया तब लोगों के मन में तरह-तरह की शंकाएं थी मगर वही लोग अब मोदी शाह की इस जुगल जोड़ी की माला जपते नहीं थकते। मोदी शाह की जोड़ी पार्टी की अगली पीढ़ी को तैयार करने में जुट गई है।  भाजपा संगठन की गतिविधियां ऐसे चल रही हैं मानो आम चुनाव नजदीक हो। कांग्रेस पार्टी लोकसभा में मिली पराजय के बाद खामोश है। जैसे उसका सब कुछ खत्म हो गया। राहुल गांधी को पार्टी ने अध्यक्ष के रूप में कम और पीएम इन वेटिंग के रूप में ज्यादा प्रचारित किया। इस कारण कांग्रेस को भारी नुकसान हुआ। ऐसा होने से सहयोगी दलों ने राहुल गांधी से दूरी बना ली और देश की जनता राहुल और नरेंद्र मोदी में तुलना करने लगी। यही कारण रहा कि राहुल गांधी की छवि को बट्टा लगा । मोदी चाहते थे कि  उनके पहले कार्यकाल में ही अमित शाह मंत्री बन जाएं लेकिन खुद शाह ने मोदी के इस आमंत्रण को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि पहले उन्हें संगठन मजबूत करना है। शाह ने कड़ी मेहनत करके दिन रात संगठन को मजबूत करने पर जोर लगाया जिसका परिणाम यह रहा कि आज भारतीय जनता पार्टी 17 से अधिक राज्यों में अपने बूते पर सरकार बनाए हुए हैं। और केंद्र में  दूसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता पर काबिज है। शाह ने भाजपा को विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बनाकर दिखाया। क्या अमित शाह की तरह  कांग्रेस का कोई बड़ा नेता आगे आकर यह कह सकता है कि मैं मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देकर संगठन की सेवा करना चाहता हूं ? संकट की घड़ी में कांग्रेस को एक बार फिर कामराज और नई इंदिरा की जरूरत है । कामराज का मिलना मुश्किल है। प्रियंका गांधी में लोगों को इंदिरा की चमक जरूर दिखाई देती है लेकिन उत्तर प्रदेश में यह चमक भी फीकी पड़ चुकी है । इसलिए कांग्रेस पार्टी और राहुल दोनों का भविष्य घनघोर संकट में दिखने लगा है। राहुल गांधी के इस्तीफे से कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटेगा। देवकांत बरुआ, नरसिम्हा राव, सीताराम केसरी जैसे गैर गांधी नेताओं को पार्टी अध्यक्ष बनाने का अनुभव गांधी परिवार भुगत चुका है इसलिए दोबारा ऐसी गलती करने से परहेज बरतना चाहेगा। बेहतर होगा  राहुल गांधी इस्तीफा वापस लें और  अपनी दादी इंदिरा गांधी,  मां सोनिया गांधी के संघर्ष से सबक लेकर  नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़े । 1999 में सोनिया गांधी ने ऐसे ही संघर्षों के बीच भंवर में फंसकर अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया था, हालांकि बाद में पार्टी नेताओं के मान मनौव्वल के बाद उन्होंने अपना इस्तीफा वापस ले लिया । इसी सोनिया गांधी के संघर्ष और प्रयासों की बदौलत ही कांग्रेस पार्टी ने देश की सत्ता पर 10 साल तक राज किया। राहुल गांधी याद रखें , आज वे जिस दौर का सामना कर रहे हैं कभी भारतीय जनता पार्टी ने भी ऐसे ही बुरे वक्त का सामना किया था लेकिन उसके नेताओं ने हिम्मत नहीं हारी।  भारतीय जनता पार्टी 2 सीटों से बढ़कर आज सवा 300 सीटों से ऊपर पहुंची है।  राहुल गांधी को भी उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए । कांग्रेस को कामराज प्लान फिर से अपनाने की जरूरत है । राहुल का हटना समाधान नहीं है क्योंकि यदि वे संकट की घड़ी में अपने कदम पीछे खींचते हैं तो लोग और इतिहास उन्हें रणछोड़ गांधी कहेगा।

( लेखक मप्र-छग से प्रकाशित विजय मत के एडिटर इन चीफ हैं)