विजय शुक्ला

लोकसभा चुनाव की आहट सुनाई दे रही है। एक-एक कर साथ छोड़ते जा रहे सहयोगी दलों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विश्व की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह की नींद उड़ा रखी है। विपक्षी दल मजबूत होते दिखाई दे रहे हैं, इस डर ने प्रधानमंत्री को बेचैन कर दिया है। केंद्र की हालत डूबते जहाज जैसी मानकर टीडीपी पहले ही एनडीए से अलग हो चुकी तो सबसे पुरानी सहयोगी शिवसेना ने महाराष्ट्र में सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान कर केंद्र के डूबते जहाज की आशंका को और बल दिया है। काश, नरेंद्र मोदी विदेशों के सैर सपाटे की बजाय देश मे निवेश, रोजगार और विकास को अधिक तवज्जो देते तो आज भाजपा की हालत डूबते जहाज वाली नहीं दिखती। तीन हिंदी राज्यों में भाजपा क्यों हारी, इस सवाल का सही जवाब न तो अमित शाह सुनने को तैयार हैं और न ही विश्व विजेता बनने का दिन में सपना देख रहे नरेंद्र मोदी । इसलिए एक-एक कर गलती पर गलती किये जा रहे हैं। राजस्थान हो या छत्तीसगढ़ या मप्र , इन राज्यों में भाजपा के पराजय की मुख्य वजह शिवराज सिंह चौहान,रमन सिंग या फिर वसुंधरा से अधिक केंद्र सरकार द्वारा पिछले साढ़े चार सालों में लिए गए बेसिर पैर वाले निर्णय हैं, जिनके कारण भाजपा की कब्र खुदनी शुरू हुई। लेकिन अरुण जेटली भला यह क्यों मानेंगे की जिस नोटबन्दी को कालेधन को खत्म करने के लिए लागू किया गया वह मोदी सरकार की कब्र खोदने वाली साबित होगी। जीएसटी बिल लाकर सरकार ने अपनी कब्र पर दूसरी बार कुल्हाड़ी चलाकर और गहरा किया। तीसरी कुल्हाड़ी केंद्र ने एससी-एसटी कानून पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित आदेश को पलट कर चलाई। और चुनाव के एन वक्त पर सवर्णों की खुशामद के लिए उसका 10 प्रतिशत आरक्षण देने कैबिनेट का फितूर भरा फैसला उसकी कब्र पर एक और कुल्हाड़ी ही साबित होने वाला है। इससे तो अच्छा होता कि राम मंदिर निर्माण पर मोदी रामभक्तों को कोई ठोस आश्वासन ही दे देते तो करोड़ों हिंदुओं के कलेजे को ठंडक मिलती और वह कम से कम इतने से ही मोदी को 2014 में वोट देने के अपने इरादे को वाजिब मान लेता। पर मोदी ने इस पर अध्यादेश लाने की बात से किनारा कर लिया। वैसे भी भाजपा का दृष्टिकोण इस मुद्दे पर कांग्रेस  जैसा है। मोदी का मंदिर निर्माण के प्रति प्रतिबद्धता पूर्ण चरित्र अभिनय ही गायब है। क्या उन्हें खुद को हिंदुत्ववादी कहने में संकोच लगने लगा है ? जब कोई एक बड़ा गुनाह होता है तो उसे छुपाने के लिए व्यक्ति से कई गलतियां हो जाती हैं। भाजपा के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। मेरी नजर में नोटबन्दी और जीएसटी एक किस्म के बड़े गुनाह हैं, जो केंद्र सरकार से हुए हैं।जनता और व्यापारी इस गुनाह की सजा निर्दोष होते हुए काटने को मजबूर हैं।  हर वर्ग को साधने के लिए भाजपा अब लॉलीपॉप पकड़ा रही है। गरीबों को 10 प्रतिशत आरक्षण का निर्णय चुनाव वक्त पर लेना कहां की बुद्धिमानी का काम है ? इसे अंजाम तक पंहुचा पाना असंभव है। क्योकि संविधान में संशोधन करना होगा। लोकसभा में दो तिहाई बहुमत से इसे पारित कराना होगा। और फिर राज्यों की विधानसभा से इसे मंजूरी दिलानी होगी। मप्र,राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकारें आ गईं हैं, इसलिए यह आरक्षण देने का निर्णय भी चूं--चूं का मुरब्बा हो सकता है। केंद्र में दोबारा आने के लिए आपके पास और बहुत सारे रास्ते थे। देश की जनता ने आपको जो प्रचंड बहुमत दिया उसका फायदा न तो आप खुद उठा पाए और न ही जनता को दिया। फिर ऐसी सरकार से फायदा क्या ? हिन्दू होने के नाते अपना वोट क्या दोबारा गड्ढे में डालने की लोग सोचेंगे ? सरकारी तोते (सीबीआई) से डराने की बजाय आप यदि अखिलेश,माया और रॉबर्ट बाड्रा के खिलाफ मुकदमे चलवाकर उन्हें जेल भिजवा देते तो भ्रस्टाचार के खिलाफ आपके स्पस्ट रुख को जनता देख भी लेती। लेकिन चुनाव की दहलीज पर खड़े होकर क्या इस कार्य पर जनता को भरोसा होगा ? बेहतर होता केंद्र टूथपेस्ट के दाम को पचास पैसे घटाने की वाहवाही लूटने की जगह रेलवे टिकट पर लिए जा रहे जीएसटी को घटा देती। तो लोगो को लाभ होता। टिकट कैंसिल कराने पर भी ज्यादा कटौती हो रही है। इससे तो कुछ नहीं होने वाला। बचे हुए समय मे केंद्र जनता और किसानों को कोई बड़ी राहत देने का निर्णय ले तो शायद बिगड़ी बात बन भी जाए वरना भैस पानी मे जाने से कोई रोक नहीं सकता।