विजय शुक्ला
विधानसभा चुनाव में शर्मनाक पराजय मिलने के बाद निवर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी  लोकप्रियता को शीर्ष पर बनाये रखने के लिए विपक्ष का चेहरा बन गए हैं। शिवराज ने जनता के बीच अपनी सक्रियता और बढ़ा दी है। 13 साल मप्र के मुख्यमंत्री रहते वे राजसी हेलिकॉप्टर से अपने पैर नीचे नहीं धरते थे लेकिन अब पैदल ,मोटरसाइकिल पर घूमने लगे हैं। व्यक्ति के अस्तित्व पर जब खतरा मंडराने लगे तो वह अधिक सक्रिय हो जाता है। शिवराज के साथ कुछ ऐसा ही खतरा है।

मध्यप्रदेश में उनकी राजनीतिक पारी पूरी हो चुकी है और केंद्रीय राजनीति उनके लिए एकमात्र विकल्प है। लेकिन इस विकल्प को पुख्ता करने के लिए उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मप्र की 29 लोकसभा सीटों में से 20 से अधिक जिताकर देनी ही होगी। तब तक केंद्र के लिए उनके दरवाजे बंद रहेंगे। ऐसा ही खतरा वसुंधरा राजे सिंधिया और रमन सिंह के साथ है। यानी तीनो राज्यों के पूर्व हो चुके मुख्यमंत्रियों को 2019 की अग्निपरीक्षा उत्तीर्ण करनी पड़ेगी। शिवराज चूंकि वक्त की नब्ज टटोलने में माहिर हैं,इसलिये जनता के बीच कूद गए। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि लोकसभा चुनाव में क्या शिवराज  भाजपा को मप्र में पिछले चुनाव की तरह 26 सीटें दिला पाएंगे ? 2014 के चुनाव में मोदी की इकतरफा लहर थी,इसलिए जिसे भी टिकट मिली वो जीत गया। राजस्थान की सभी 25 सीटों पर मोदी मैजिक चला तो कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया को छोड़कर मप्र की 27 सीटों पर भाजपा जीती। छत्तीसगढ़ की 11 में  10 सीटें उसे मिलीं। यानी तीन राज्यों की कुल 60 में 58 सीटें भाजपा को मिलीं। लेकिन 2019 की राजनीतिक परिस्थितियों में काफी भिन्नता है। तीन हिंदी भाषी राज्यों को भाजपा हार चुकी है। अब यहां कांग्रेस की सत्ता है। मोदी मैजिक की हवा निकल चुकी है। प्रधानमंत्री स्वयं सहयोगी दलों को साथ रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सहयोगी दल उनका साथ एक-एक कर छोड़ते जा रहे हैं। शिवसेना गुर्रा रही है।

वसुंधरा,रमन और शिवराज के नेतृत्व एवं चेहरे को जनता खारिज कर चुकी है। मुख्यमंत्री के रूप में जो पॉवर और ग्लैमर शिवराज के साथ होता था ,वह अब मुख्यमंत्री कमलनाथ के पास है। हां, एक बात शिवराज के लिए थोड़ी पॉजिटिव जरूर है कि जनता में उनकी लोकप्रियता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। माई का लाल वाला बयान के कारण अनारक्षित वर्ग की निगाह में उनकी छवि की मिट्टी कुटी लेकिन दलित-आदिवासी और पिछड़े वर्ग में उनकी साख बची हुई है। मेरा शुरू से यह मत रहा है कि यदि 2018 के चुनाव में भाजपा ने रमन,शिवराज को बदलकर किसी दूसरे चेहरे को आगे रख चुनाव लड़ा होता तो मप्र में भाजपा की सत्ता जाने से बच सकती थी। बाद में संघ की एक रिपोर्ट सुनाई पड़ी जिसमे उसने भी यही बात कही।

मुख्यमंत्री के रूप में कार्य करना और कॉमन मैन बनकर रहना दोनों में बहुत फर्क है। जब शिवराज मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने कॉमन मैन की सुध कभी नही ली। ली होती तो यह हरगिज न कहते "कोई माई का लाल आरक्षण खत्म नहीं कर सकता"। यह बयान 2019 के आम चुनाव में भी शिवराज सिंह चौहान का पीछा छोड़ने वाला नहीं है। एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने का फायदा भाजपा को तीनों राज्यों में नहीं मिला। ट्रिपल तलाक का कार्ड भी नहीं चला। विधानसभा चुनाव में भाजपा ने मप्र के विंध्य क्षेत्र में अनारक्षित सीटों पर ब्राम्हणों को टिकट बांटी इसलिए एससी-एसटी एक्ट के नुकसान से बच गई। दूसरी वजह वह जूता था ,जिसे शिवराज की तरफ फिकवाया गया था। जनता ने कांग्रेस को ठेंगा दिखा दिया। लेकिन ग्वालियर-चम्बल में यही एक्ट उसे ले डूबा। दलितों ने कांग्रेस को बम्पर वोट दिया। लोकसभा चुनाव में तीनों राज्यों में कांग्रेस का दबदबा होने से भाजपा को लोकसभा में नुकसान होना तय है। आज चुनाव हो जाएं तो मप्र में कांग्रेस को 20 से अधिक सीटों पर फायदा होगा। शिवराज को बदलने से भाजपा बिगड़ती बात थोड़ा और संभाल सकती है। लेकिन उसे यह सूझे तब न। सत्ता जाने से भाजपा के सामने  विघटन की चुनौती होगी। 15 साल कांग्रेस को छोड़ भाजपा के साथ खड़े बिचौलिए फिर कांग्रेस में होंगे।

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया गिन-गिन के भाजपा से बदला लेंगे। भाजपा से कई नेता रिश्ता खत्म कर लेंगे। इन हालातों में भाजपा को शिवराज सिंह चौहान बढ़त कैसे दिला पाएंगे ? शिवराज
रण में अकेले हैं। नरेंद्र सिंह तोमर, कैलाश विजयवर्गीय, उमा भारती, बाबूलाल गौर ने किनारा कर लिया है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह की ऐसी क्षमता नहीं कि वे एक सीट जिता लें। खुद उनकी संसदीय सीट जबलपुर खतरे में आ गई है। केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ग्वालियर-मुरैना से दोबारा नहीं जीत सकते। इसलिये भोपाल की जुगाड़ में हैं। और शिवराज उन्हें भोपाल और विदिशा से उतरने नहीं देंगे। वे खुद लोकसभा लड़ेंगे। बिखराव के माहौल में सत्ता से बाहर होकर भाजपा दिनों दिन कमजोर होती जाएगी। हर तरह से खतरा और घाटा भाजपा को है।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की लोकप्रियता न पहले ही थी और न अब है, वे तो मोदी के कारण सफलता के रथ पर सवार हैं। लेकिन अब मोदी की चमक फीकी पड़ चुकी है। हिंदुत्व के जिस तिलक के सहारे भाजपा अपने साम्राज्य को फैलाती जा रही थी वह तिलक राहुल गांधी ने माथे पर लगा लिया है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल चमकने लगे हैं। लेकिन  फिर भी उनसे अधिक मोदी देश की जनता में लोकप्रिय हैं। 2019 का चुनाव विकास के मुद्दे पर भाजपा नहीं लड़ पाएगी। राहुल को हिंदीभाषी प्रांतों से अच्छी बढ़त मिलेगी। यानी मुकाबला बराबरी का हो चुका है।

राहुल की छतरी तले टीडीपी सहित 16 पार्टियां आ गई है ममता,माया मौका देख निर्णय लेगी। यूपी में भाजपा की सीटें 72 से घटकर 45 पर पहुंच सकती हैं। कुलमिलाकर राहुल गांधी बढ़ रहे हैं तो मोदी घटने लगे हैं। शिवराज सिंह, रमन और वसुंधरा क्या मिशन मोदी को अपने -अपने राज्यों में बढ़त दिला पाए तो उनका सूर्य चमकेगा वरना...। देश मे 1977 जैसे आपातकालीन  हालात नहीं हैं लेकिन नोटबन्दी,जीएसटी,बेरोजगारी, महंगाई ,वादाखिलाफी और मीडिया पर अघोषित सेंशरशिप इंदिरा काल की याद दिलाते हैं । इस कारण जनता में पीएम मोदी के खिलाफ आक्रोश पनपने लगा है। लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं कि पूरी तरह से बाजी पलट गई।यूपीए शाशन में रुपये की गिरती कीमतों पर नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर तीखे कटाक्ष किये थे। आज जब मोदी प्रधानमंत्री हैं, रुपया तेजी से नीचे लुढ़कता जा रहा। वास्तव में मोदी की साख का हाल भी रुपए जैसा ही है।

Source : विजय शुक्ला