विजय शुक्ला
मप्र का मुख्यमंत्री बनने के ठीक बाद कमल नाथ ने चुनाव के दौरान राहुल गांधी की किसानों की कर्जमाफी के वादे को पूरा कर सरकारी मंजूरी दी। किसानों को 1000 रुपये प्रति माह पेंशन, बेटियों की शादी के लिए 51 हजार रुपये, आंगनबाड़ी आशा कार्यकर्ता के वेतन में दो हजार वृद्धि, महिलाओं के लिए डिलेवरी पर 26 हजार रुपये अनुदान,पुलिस को साप्ताहिक अवकाश की मंजूरी मिल गई और भी कई घोषणाओं पर मुहर लगाई जाने वाली है। कमलनाथ ने फिजूलखर्ची रोकने के लिए मुख्यमंत्री और मंत्रियों के लिए सरकारी हेलिकॉप्टर का खर्च स्वयं उठाने के निर्देश देकर जनता को संदेश देने की कोशिश की है कि पूर्ववर्ती सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चौहान की तरह बुदनी और जैत तक जाने के लिए वे सरकारी उड़न खटोले का बेजा इस्तेमाल न तो खुद करेंगे और दूसरों को न करने देंगे। कमलनाथ को सरकारी हेलिकॉप्टर की जरूरत भला क्यों होगी, उनके पास तो कई निजी हेलिकॉप्टर और चार्टर हवाई जहाज हैं, सालों से वे उसका उपयोग करते आये हैं और दूसरों को कराते भी रहे हैं। नई सरकार के सिर पर शिवराज सरकार एक लाख अस्सी करोड़ रुपये का कर्ज छोड़ गई है। फिर भी कमलनाथ बिना किसी परवाह के सरकारी खजाने का मुहं खोलकर लुटाए जा रहे हैं। कमलनाथ की स्थिति फिलहाल उस राजा की तरह है जो प्रजा से कहता है ले लो जितना खजाना चाहिए लेकिन खजाने में फूटी कौड़ी नहीं । कहावत भी है घर मे नहीं दाने अम्मा चली भुनाने। नई सरकार बड़ी हड़बड़ी में है क्योंकि उसके सामने लोकसभा चुनाव की सबसे विकराल चुनौती है। नरेंद्र मोदी को केंद्र की सत्ता से नीचे उतारना है। राहुल गांधी को देश का नया सम्राट बनाना है। वैसे तीन राज्यों मप्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की जनता ने भाजपा सरकार के घमंड का जिस दिलेरी से पिंडदान किया है, बधाई की पात्र है। जनता तो जनता होती है , किसी को कैसे चूहा और कब शेर बनाना है, उसे मालूम है। कमलनाथ सरकार जल्दी में इसलिए भी है क्योंकि वह अल्पमत में है। बहुमत से 2 सीटें दूर। सपा,बसपा और निर्दलीयों की बैशाखी के सहारे इस लंगड़ी सरकार को चलाना मजबूरी है। लेकिन यह बैशाखी कब तक कांग्रेस को ताकत देगी, लोकसभा चुनाव होने का इंतज़ार कीजिये। मप्र की जनता ने भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों को चुनाव में नकारा है। अगर भाजपा को 109 से बढ़कर 112 सीटें मिल जातीं तो गोवा का जनादेश घोटाला फिर देखने को मिलता। खैर, अपनी किसी से न तो दोस्ती है और न दुश्मनी इसलिए फक्कड़ मिजाजी हैं। सच कहते हैं। कर्ज के दलदल में बुरी तरह फंसी कमलनाथ सरकार ने किसानों की कर्जमाफी से 38 हजार करोड़ रुपये पीठ पर और लाद लिए। वह कहां से आएंगे ? तो एक लघु कथा सुनिए और समझ जाइये।  मुखिया ने एक रोज ठंड से ठिठुरती भेड़ों से कहा तुम सबको जल्द ऊनी स्वेटर मिलेगी। यह सुनकर भेड़ें खुशी के मारे उछल पड़ीं। उन्हें लगा इस ठंड से अब जान बचेगी। पास खडा एक गधा मौन था। भेड़ों ने उससे पूछा तुम हमारी खुशी में मौन क्यों हो ? क्या तुम्हें खुशी हुई ? गधे ने मायूस होकर कहा, तुम जिस घोषणा से बहुत खुश हो रहे हो न उसकी असलियत सुनकर रोने लगोगे। भेड़ों को तो बस स्वेटर दिख रहा था। गधे ने कहा, मुखिया जी स्वेटर के लिए उन कहां से लाएंगे ? उनकी जेब तो खाली है। यह सुन भेंडो की खुशी सन्नाटे में बदल गई। वे सोच में पड़ गईं। गधे ने कहा, मुखिया ऊन के लिए तुम्हारी चमड़ी उधेड़ेगा। मतलब आप समझ गए होंगे। भेड़ों पर दिखाई जा रही दया का खामियाजा आम आदमी खासकर उस मिडिल मैन को भुगतना पड़ेगा जो टैक्स देता है। पिछली सरकारों ने भी ऐसा ही किया है। केंद्र भी यही कर रहा है। सत्ता न जाये मध्यम वर्ग, व्यापारी चाहे मर भी जाए तो गम नहीं। भेड़ों को मुफ्तखोरी की आदत हो गई है। उसे सब मुफ्त में चाहिए। राशन, तेल,शक्कर,अनाज,फीस, कपड़ा,जूता सब। इस मुफ्तखोरी के चलते मजदूर ने काम करना छोड़ दिया है। किसान बैंकों से कर्ज और लेगा। उसे भरोसा है अगली सरकार दो लाख की बजाए 4 लाख माफ कर देगी। बैंकों की कमर टूट चुकी है। जरूरतमंद किसानों का हक वे किसान मार रहे हैं, जो खेती पर पूरी तरह आश्रित नहीं हैं। सवाल है किसानों को राहत कैसे मिलेगी ? उसे अपनी उपज का असली दाम कब मिलेगा ? कर्ज के मर्ज का ईलाज करने की बजाय सरकारें उसे लाईलाज बनाने पर तुली हुईं हैं। कर्जमाफी किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकती। थोड़ी राहत जरूर बन सकती है। केंद्र सरकार ने उद्योगपतियों के लाखों करोड़ कर्ज माफ किये। बाप का राज है क्या ? टैक्स देने वालों पर और टैक्स देने का उपाय खोजना बंद हो। सम्पन्न किसानों से भी टैक्स वसूली की जाए। इनकम छुपाने के लिए लोग किसान का रूप धर लेते हैं। टैक्स न देना पड़े। हां, जो किसान सिर्फ खेती पर निर्भर हैं। जिनके पास दो से 5 एकड़ तक खेत हैं, उन्हें सरकार सहायता दे, लेकिन मुफ्त उन्हें भी कुछ न दिया जाए। वरना खाद का संकट कभी खत्म नहीं होगा। आर्थिक रूप से अति कमजोरों की मदद भी होनी चाहिए। प्रधानमंत्री आवास योजना और इंदिरा आवास योजना का अधिकांश लाभ उन्हें अधिक मिला जो आवासहीन नहीं हैं। लेकिन इसकी जांच कौन करे? समय किसके पास है। लोगों ने दो-दो घर ले लिए। पांच बार टॉयलेट की राशि ले ली। मध्यप्रदेश की वर्तमान सरकार मेरी दृष्टि में कागज की नाव पर सवार है। उसके पास न तो पर्याप्त बजट है और न ही पूर्ण बहुमत। इसलिए सरकार चलाने में बहुत दिक्कते आएंगी। कमलनाथ चूंकि एक बड़े उद्योगपति हैं, इसलिए वित्तीय संकट समाधान के बारे में वे बेहतर तरीके खोज सकते हैं। उन्हें सबसे पहले नौजवानों के लिए रोजगार के अवसर देने चाहिए क्योंकि इसी वर्ग के कारण कांग्रेस सरकार बनी है। सत्ता में दोबारा आने के लिए मोदी सरकार पास मंदिर मुद्दा है लेकिन कर्जमाफी उससे बड़ा अस्त्र है। प्रधानमंत्री कर्जमाफी की घोषणा करें लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि यूपीए सरकार ने भी कर्ज माफ किये थे लेकिन जनता ने उन्हें सत्ता से बाहर फेंक दिया था। कमलनाथ सत्ता रूपी कागज की नाव को कब और कहां तक आगे ले जाते हैं, हमारी नजर होगी।